भ. गी. 1.41

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥

अनुवाद

हे वृष्णिवंशी कृष्ण ! अधर्म के फैलने से कुल में स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं और स्त्रियों के दूषित होने से वर्णों का मिश्रण आरम्भ होता है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, 'संस्कार' और 'संकर' (वर्णसंकर) के मूल अंतर तथा 'कारण और कार्य' के दार्शनिक नियम के आधार पर वर्णसंकर संतान का आचरण धर्म-विरोधी क्यों हो जाता है?

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