भ. गी. 1.45

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥

अनुवाद

हाय ! हमने बड़ा पाप करने का निश्चय किया है क्योंकि हम राजसुख के लोभ से अपने ही स्वजनों की हत्या के लिए उद्यत हैं ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, कुरुक्षेत्र में अर्जुन का विचार और तर्क बदलने के पीछे मानव मन और बुद्धि की कौन सी सूक्ष्म कार्यप्रणाली उजागर होती है, और भक्ति मार्ग में 'अहंकार' के समाधान का क्या वास्तविक स्वरूप बताया गया है?

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