भ. गी. 1.47
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥
अनुवाद
सञ्जय ने कहा – रणभूमि में ऐसा कहकर दुखी मन से शोकग्रस्त अर्जुन ने
अपने धनुष और बाण रख दिये, और अपने रथ के पिछले भाग में बैठ गया ।
सञ्जय ने कहा – रणभूमि में ऐसा कहकर दुखी मन से शोकग्रस्त अर्जुन ने
अपने धनुष और बाण रख दिये, और अपने रथ के पिछले भाग में बैठ गया ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि अर्जुन का यह भाव निष्काम नहीं था, बल्कि मोह और स्वार्थ से प्रेरित था। वह केवल यह सोच रहा था कि निःशस्त्र होकर मर जाने से उसका स्वयं का कल्याण और प्रायश्चित हो जाएगा।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार, पहले अर्जुन सबके कल्याण ('वयं') की बात कर रहा था, लेकिन अपने अंतिम वचन में वह 'तन्मे' (मेरा कल्याण) कहकर अपने व्यक्तिगत हित की बात करता है। वह सोचता है कि हथियार डालकर निःशस्त्र मर जाने से उसका प्रायश्चित हो जाएगा और उसे अनियत काल तक नरक भोगने से मुक्ति मिल जाएगी।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि भगवान अर्जुन की बातों से तनिक भी सहमत नहीं थे। भगवान ने उसके इस मोह को 'कश्मल' (मल/दोष) तथा 'अनार्यजुष्टम्' (श्रेष्ठ पुरुषों के अयोग्य) कहा और उसके इस अनुचित आचरण पर आश्चर्य व्यक्त किया।
विकल्प ख (सही): वक्ता के अनुसार, किसी भ्रमित व्यक्ति को बीच में रोकने के बजाय पूरा सुनने से उसका अहंकार शांत होता है और वह उपदेश ग्रहण करने हेतु तैयार होता है। भगवान द्वारा 'कुतः' (कहाँ से आया) कहना यह दर्शाता है कि यह मोह अर्जुन का मूल स्वभाव नहीं बल्कि बाहरी और अस्थायी (आगंतुक) है, जिसे दूर किया जा सकता है।
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