भ. गी. 10.9
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
अनुवाद
जिनका मन मुझमें आसक्त है और जिनका जीवन मेरे प्रति समर्पित है, वे नित्य एक-दूसरे को मेरे विषय में ज्ञान देते हुए और मेरी चर्चा करते हुए अत्यन्त सन्तुष्टि और आनन्द का अनुभव करते हैं।