विभूतियोग

इस अध्याय में बयालीस श्लोक हैं, जिनमें से सात अर्जुन के द्वारा और पैंतीस भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा बोले गए हैं । श्रीकृष्ण ने नौवें अध्याय का समापन अर्जुन के प्रति अनन्य समर्पण का निर्देश करते हुए किया । तथापि, श्रीकृष्ण अभी तक नौवें अध्याय में अपने विषय में जो कुछ भी बता चुके थे, उससे वे सन्तुष्ट नहीं थे । जिस प्रकार भक्त श्री भगवान के वैभव को विस्तार से जानने के लिए उत्सुक रहता है, उसी प्रकार, भगवान भी अपने प्रिय भक्त अर्जुन को गोपनीय विभूति दर्शाने के लिए उत्सुक हैं । अर्जुन से बिना किसी पूछताछ के, उस पर कृपा करने के लिए, वे इस जगत में व्याप्त, परम तत्त्व पर ध्यान की प्रक्रिया का वर्णन आरम्भ करते हैं ।

श्रीकृष्ण का हृदय अपने भक्त के लिए पिघलता है और इसी कारण से वे अपनी महिमा (२-६) का वर्णन करते हैं । परवर्त्ती चार श्लोक भगवद् गीता के सार को प्रकट करते हैं, जिसका अर्थ है अनन्या भक्तियोग (८-११) । भगवान की अपने भक्तों के लिए करुणा को सुनकर, अर्जुन गद्-गद हो जाता है और श्रीकृष्ण की स्तुति करता है । वह श्रीकृष्ण से उनकी दिव्य विभूति और महिमा को विस्तार से कहने के लिए विनती करता है। वह श्रीकृष्ण की महिमा के बारे में विस्तार से सुनना चाहता है, ताकि वह अपने सांसारिक कर्तव्यों (१२-१८) का पालन करते हुए उनका ध्यान कर सके।

शेष अध्याय में उनकी महिमा (१९-३९) के रूप में श्रीकृष्ण की विभूति जो इस जगत में सर्वत्र व्याप्त है उसका विवरण प्रस्तुत किया गया है । श्रीकृष्ण यह साररूप मे बताते हैं कि उनकी विभूति का कोई अन्त नहीं है, तथा यह जगत उनके मात्र एक अंश की अभिव्यक्ति ही है: " हे अर्जुन ! सभी प्राणियों की उत्पत्ति भी मैं हूँ । अतः ऐसा कोई भी चराचर प्राणी नहीं है, जिसका अस्तित्त्व मेरे बिना सम्भव है । हे परन्तप ! मेरी विभूति का कोई अन्त नहीं है । मेरी विभूति का यह वर्णन मात्र सङ्क्षिप्त विवरण है, जो स्वयं मेरे द्वारा कहा गया है" (३९-४०) । अपनी प्रधान विभूतियों का वर्णन करते हुए, श्रीकृष्ण कहते हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड उनकी शक्ति के एक अंश का प्रकटीकरण है । (४२) ।

सभी श्लोक

  1. श्लोक 1श्री भगवान ने कहा: हे महाबाहो! मेरे परम वचनों को पुनः सुनो। मैं तुम्हारे हित के लिए तुम्हें बताऊँगा, क्योंकि [तुम उनमें] आनन्द लेते हो।
  2. श्लोक 2न तो देवता और न ही महर्षि मेरे जन्म के तत्त्व को जानते हैं, क्योंकि मैं ही प्रत्येक प्रकार से देवताओं और महर्षियों का उद्गम हूँ।
  3. श्लोक 3जो मुझे अजन्मा, अनादि, तथा समस्त प्राणियों का महेश्वर जानता है, वह मनुष्यों में मोहरहित है और समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
  4. श्लोक 4-5सूक्ष्म विवेक की शक्ति, ज्ञान, संयम, क्षमा, सत्यवादिता, बाह्य इन्द्रियों का नियंत्रण, मन का नियंत्रण, सुख, दुःख, जन्म, मृत्यु, भय और अभय, तथा अहिंसा, समता, सन्तोष, तप, दान, यश और अपयश—प्राणियों के ये सभी विविध प्रकार के भाव केवल मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
  5. श्लोक 6सात महर्षि, और उनसे पूर्व चार कुमार तथा चौदह मनु, मेरे मन से उत्पन्न हुए, जो मेरे स्वरूप की अभिव्यक्ति है। इन्हीं से इस संसार के समस्त प्राणी प्रकट हुए हैं।
  6. श्लोक 7जो मेरे इस परम ऐश्वर्य और मेरी भक्ति के योग को तत्त्वतः जानता है, वह अचल योग से युक्त हो जाता है। इसमें कोई संशय नहीं है।
  7. श्लोक 8मैं ही सबका उद्गम हूँ, और सब कुछ मुझसे ही प्रवर्तित होता है। यह जानकर भक्ति से युक्त बुद्धिमान लोग मेरी उपासना करते हैं।
  8. श्लोक 9जिनका मन मुझमें आसक्त है और जिनका जीवन मेरे प्रति समर्पित है, वे नित्य एक-दूसरे को मेरे विषय में ज्ञान देते हुए और मेरी चर्चा करते हुए अत्यन्त सन्तुष्टि और आनन्द का अनुभव करते हैं।
  9. श्लोक 10ऐसे भक्तों को, जो सदा मुझसे जुड़े रहते हैं और प्रेमपूर्वक मेरी उपासना करते हैं, मैं वह बुद्धियोग [अर्थात् प्रेम] प्रदान करता हूँ, जिसके द्वारा वे मेरे पास आते हैं।
  10. श्लोक 11केवल उन पर अनुग्रह करने के लिए, मैं उनके चित्त में स्थित होकर, ज्ञान के प्रकाशमान दीपक से अज्ञानजनित अन्धकार का नाश करता हूँ।
  11. श्लोक 12-13अर्जुन ने कहा: आप परम ब्रह्म, परम आश्रय और परम पवित्र हैं। समस्त ऋषि, जैसे देवर्षि नारद, असित, देवल और व्यास, आपको सनातन दिव्य पुरुष, आदि देव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं। और आप स्वयं भी मुझे यही बता रहे हैं।
  12. श्लोक 14हे केशव! आप जो कुछ भी मुझसे कहते हैं, मैं उसे सत्य मानता हूँ। हे भगवन्! वास्तव में न तो देवता और न ही दानव आपके प्राकट्य के तत्त्व को जानते हैं।
  13. श्लोक 15हे परम पुरुष! हे समस्त प्राणियों के उद्गम! हे प्राणियों के ईश्वर! हे समस्त देवताओं के पूजनीय प्रभु! हे जगत् के स्वामी! आप स्वयं ही अपने को अपने द्वारा जानते हैं।
  14. श्लोक 16इसलिए केवल आप ही अपनी उन दिव्य विभूतियों का पूर्ण वर्णन कर सकते हैं, जिन विभूतियों के द्वारा आप इन समस्त लोकों में व्याप्त होकर स्थित हैं।
  15. श्लोक 17हे योगमाया-शक्ति के स्वामी! हे भगवन्! मैं आपका किस प्रकार निरन्तर चिन्तन करूँ जिससे मैं आपको जान सकूँ? और किन-किन विभिन्न वस्तुओं में आप मेरे द्वारा चिन्तनीय हैं?
  16. श्लोक 18हे जनार्दन! अपनी शक्तियों और विभूतियों का पुनः विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनकर भी मेरी तृप्ति नहीं हुई है।
  17. श्लोक 19श्री भगवान ने कहा: हे प्रिय! हे कुरुश्रेष्ठ! मैं तुमसे अपनी प्रमुख दिव्य विभूतियों का ही वर्णन करूँगा, क्योंकि मेरी अभिव्यक्तियों का कोई अन्त नहीं है।
  18. श्लोक 20हे गुडाकेश! मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ। मैं ही वास्तव में प्राणियों का आदि, मध्य और अन्त हूँ।
  19. श्लोक 21अदिति के बारह पुत्रों में मैं विष्णु हूँ; [नभचर] ज्योतियों में मैं तेजस्वी सूर्य हूँ; उनचास मरुतों में मैं मरीचि हूँ; और नक्षत्रों* में मैं चन्द्रमा हूँ।
  20. श्लोक 22वेदों में मैं सामवेद हूँ; देवताओं में मैं इन्द्र हूँ; इन्द्रियों में मैं मन हूँ; और प्राणियों में मैं चेतनाशक्ति हूँ।
  21. श्लोक 23ग्यारह रुद्रों में मैं शङ्कर हूँ; यक्षों और राक्षसों में मैं कुबेर हूँ; आठ वसुओं में मैं पावक (अग्नि) हूँ; और पर्वतों में मैं मेरु हूँ।
  22. श्लोक 24हे पार्थ! पुरोहितों में प्रमुख बृहस्पति मुझे जानो; सेनापतियों में मैं स्कन्द हूँ; और जलाशयों में मैं समुद्र हूँ।
  23. श्लोक 25महर्षियों में मैं भृगु हूँ; वाणी में मैं अविनाशी एकाक्षर ॐ हूँ; यज्ञों में मैं जपयज्ञ हूँ [मन्त्र और नामजप]; और स्थावर वस्तुओं में मैं हिमालय हूँ।
  24. श्लोक 26समस्त वृक्षों में मैं अश्वत्थ* वृक्ष हूँ; देवर्षियों में मैं नारद हूँ; गन्धर्वों में मैं चित्ररथ हूँ; और सिद्धों में मैं कपिल मुनि हूँ।
  25. श्लोक 27घोड़ों में मुझे उच्चैःश्रवा जानो, जो अमृत* के लिए समुद्र-मन्थन से उत्पन्न हुआ था; श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत, और मनुष्यों में राजा [जानो]।
  26. श्लोक 28शस्त्रों में मैं वज्र हूँ; गायों में मैं कामधेनु [जो इच्छाओं को पूर्ण करती है] हूँ; [कन्दर्पों में] मैं सन्तानोत्पत्ति का हेतु कन्दर्प हूँ, और सर्पों में मैं वासुकि हूँ।
  27. श्लोक 29नागों* में मैं अनन्त हूँ; जलचर प्राणियों में मैं वरुण हूँ; पितरों में मैं अर्यमा हूँ; और नियम स्थापित करने वालों में मैं यम हूँ।
  28. श्लोक 30दैत्यों में मैं प्रह्लाद हूँ; वशीकरण करने वालों में मैं काल हूँ।; पशुओं में मैं सिंह हूँ; और पक्षियों में मैं गरुड़ हूँ।
  29. श्लोक 31शुद्ध करने वालों में मैं वायु हूँ; शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ; मछलियों में मैं मकर हूँ; और नदियों में मैं गङ्गा हूँ।
  30. श्लोक 32हे अर्जुन! मैं समस्त उत्पन्न वस्तुओं का आदि, अन्त और मध्य हूँ। विद्याओं में मैं आत्मा से सम्बन्धित ज्ञान हूँ, और विभिन्न प्रकार के तर्क-वितर्कों में मैं निर्णायक तर्क हूँ।
  31. श्लोक 33अक्षरों में मैं ‘अ’ अक्षर हूँ; समासों में मैं द्वन्द्व समास हूँ। मैं ही अविनाशी काल हूँ, और मैं सर्वतोमुख ब्रह्मा हूँ।
  32. श्लोक 34मैं सर्वस्व का हरण करने वाली मृत्यु हूँ, और जो कुछ भविष्य में उत्पन्न होने वाला है उसका उद्भव भी हूँ। स्त्रियों में मैं कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा की अधिष्ठात्री देवियाँ हूँ।
  33. श्लोक 35सामवेद के सामों में मैं बृहत्साम हूँ; छन्दों में मैं गायत्री हूँ; महीनों में मैं अग्रहायण* हूँ; और ऋतुओं में मैं वसन्त हूँ।
  34. श्लोक 36छल करने वालों में मैं जुआ हूँ; शक्तिशालियों में मैं पराक्रम हूँ। मैं विजय हूँ, मैं प्रयत्न हूँ, और मैं बलवानों का बल हूँ।
  35. श्लोक 37वृष्णियों में मैं वासुदेव (बलराम*) हूँ; पाण्डवों में मैं धनञ्जय (अर्जुन) हूँ; मुनियों (महान चिन्तकों) में मैं व्यास हूँ; और बुद्धिमानों में मैं दूरदर्शी शुक्राचार्य हूँ।
  36. श्लोक 38दमन करने वालों का मैं दण्ड हूँ; विजय की इच्छा रखने वालों की मैं नीति हूँ; रहस्यों में मैं मौन हूँ; और तत्त्वज्ञानियों का मैं ज्ञान हूँ।
  37. श्लोक 39और हे अर्जुन! समस्त प्राणियों का जो मूल उद्गम है, वह भी मैं ही हूँ। इसलिए ऐसा कोई भी चर या अचर प्राणी नहीं है जिसका मेरे बिना अस्तित्त्व हो।
  38. श्लोक 40हे परंतप! मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अन्त नहीं है। मेरी विभूतियों का यह विवरण मैंने केवल संक्षेप में कहा है।
  39. श्लोक 41जो कोई भी अस्तित्ववान वस्तु गौरवशाली, ऐश्वर्ययुक्त अथवा शक्तिशाली है, उसे मेरे तेज के एक अंश से प्रकट हुआ जानो।
  40. श्लोक 42किन्तु, हे अर्जुन! तुम्हारे लिए इन सब बातों को विस्तार से जानने का क्या प्रयोजन है? मैं अपनी शक्ति के केवल एक अंश से इस सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त होकर स्थित हूँ।

प्रश्न

इस अध्याय के मुख्य प्रश्न