भ. गी. 11.23
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥
अनुवाद
हे महाबाहु! आपके इस विशाल रूप को, जो असंख्य मुखों और नेत्रों से युक्त है, जिसकी अनन्त भुजाएँ, जाँघें और चरण हैं, जिसमें अनेक उदर हैं और असंख्य भयानक दाँत हैं, देखकर लोक और मैं भी विस्मयाकुल हो रहे हैं।