भ. गी. 2.13
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
अनुवाद
जैसे आत्मा के देह में ही बाल्य, यौवन, और फिर वृद्धावस्था होती है, वैसे ही आत्मा को [मृत्यु के बाद] दूसरे देह की प्राप्ति होती है । धीर व्यक्ति इससे मोहित नहीं होता ।
जैसे आत्मा के देह में ही बाल्य, यौवन, और फिर वृद्धावस्था होती है, वैसे ही आत्मा को [मृत्यु के बाद] दूसरे देह की प्राप्ति होती है । धीर व्यक्ति इससे मोहित नहीं होता ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार 'देह' शरीर को कहते हैं और 'देही' देह से भिन्न आत्मा को कहते हैं; विकल्प क में इनकी परिभाषाएँ विपरीत दी गई हैं। इसके अतिरिक्त मृत्यु से आत्मा का विनाश नहीं होता, बल्कि उसे नया शरीर मिलता है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि 'देह' का अर्थ उपचय (अंगों व भोजन का ढेर) है और 'देही' देह का स्वामी है। जिस प्रकार बाल्यावस्था, युवावस्था और बुढ़ापा शरीर का परिवर्तन है, उसी प्रकार मृत्यु के बाद आत्मा का दूसरे शरीर में जाना केवल देहांतर प्राप्ति है, जिससे धीर पुरुष मोहित नहीं होते।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि इंद्रियाँ थर्मामीटर की भाँति बाहर के विषयों को नापती हैं, इसलिए उन्हें 'मात्रा' कहा गया है। कोई भी वस्तु स्वयं सुखद या दुखद नहीं होती (जैसे गर्म पानी सर्दी में सुख देता है और गर्मी में दुःख)। यह केवल मन की अनुकूल या प्रतिकूल प्रतिक्रिया है जो 'आगमापायी' (आने-जाने वाली/अनित्य) है, अतः साधक को इन्हें सहन (तितिक्षा) करना चाहिए।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में इस धारणा का पूरी तरह खंडन किया गया है; वस्तुओं में अपना कोई स्वतंत्र सुख या दुःख नहीं होता, यह केवल हमारे मन के राग-द्वेष और संस्कारों पर आधारित होता है।
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