भ. गी. 2.15
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥
अनुवाद
हे पुरूषश्रेष्ठ ! जो धीर व्यक्ति इन इन्द्रिय-स्पर्शों से व्यथित नहीं होता है, सुख और दुःख में समान रूप से स्थित रहता है, वह निश्चय ही अमरत्व का पात्र है ।
हे पुरूषश्रेष्ठ ! जो धीर व्यक्ति इन इन्द्रिय-स्पर्शों से व्यथित नहीं होता है, सुख और दुःख में समान रूप से स्थित रहता है, वह निश्चय ही अमरत्व का पात्र है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार सुख और दुःख बाहरी वस्तुओं में नहीं बल्कि हमारी दृष्टि और मानसिक स्थिति पर निर्भर करते हैं। इसके अतिरिक्त, केवल दुःख ही नहीं बल्कि सुख भी मन को उद्वेलित करता है; अतः दोनों ही व्यथा के रूप हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि मूल शब्द 'खा' है जिसमें दृष्टिकोण के अनुसार 'सु' या 'दुस्' जुड़ जाता है (जैसे होलोग्राफिक तस्वीर एक कोण से अलग और दूसरे से अलग दिखती है)। इसके साथ ही, श्लोक में 'एते' (द्विवचन/बहुवचन) का प्रयोग दर्शाता है कि सुख और दुःख दोनों ही मन को विचलित करने वाली व्यथाएँ हैं, और सुख में आसक्त रहना ही दुःख का बीज बोना है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान में श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की व्याख्या के अनुसार शरीर और आत्मा दोनों सत्य हैं, किंतु आत्मा असंग है और उनके बीच का 'संबंध' असत् (माना हुआ) है। साथ ही, अद्वैत वेदांत जहाँ जीव, ईश्वर और मिथ्या (संसार) तीन बातें मानता है, वहीं भगवद्गीता केवल दो ही तत्त्वों—सत् (चेतन/आत्मा) और असत् (जड़/प्रकृति)—का विवेक सिखाती है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि आत्मा सत् (नित्य व अपरिणामी) है, असत् नहीं। इसके अलावा, वंध्या-पुत्र या गधे के सींग का उदाहरण अद्वैत वेदांतियों की व्याख्या में आता है, जबकि वैष्णव आचार्यों के अनुसार गीता में संसार को मिथ्या नहीं बल्कि परिणामी/अनित्य असत् माना गया है।
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