भ. गी. 2.29
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥
अनुवाद
कोई इसे (आत्मा को) आश्चर्यमय मानता है, कोई इसे आश्चर्यमय कहता है, कोई इसे आश्चर्यमय सुनता है, जबकि अन्य व्यक्ति सुनकर भी इसे बिलकुल भी नहीं समझ पाते ।
कोई इसे (आत्मा को) आश्चर्यमय मानता है, कोई इसे आश्चर्यमय कहता है, कोई इसे आश्चर्यमय सुनता है, जबकि अन्य व्यक्ति सुनकर भी इसे बिलकुल भी नहीं समझ पाते ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि अद्वैत वेदांती रज्जु-सर्प के दृष्टांत से जगत को ही मिथ्या मानते हैं। इसके विपरीत वैष्णव मत के अनुसार प्रकृति भगवान की अपनी शक्ति ("भिन्ना प्रकृतिरष्टधा") होने से सत्य है; किंतु जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद न रहने वाले इस शरीर से 'ममत्व' या आत्म-बुद्धि का संबंध जोड़ना ही वास्तविक अविद्या और असत् है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि अद्वैत वेदांत जगत को मिथ्या बताता है और वैष्णव मत संसार को भगवान की शक्ति मानता है; विकल्प ख में दोनों सिद्धांतों को विपरीत रूप से प्रस्तुत किया गया है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार बाह्य इंद्रियाँ केवल अपने योग्य भौतिक विषयों को ही ग्रहण कर सकती हैं, आत्मा को नहीं। आधुनिक विज्ञान केवल बाह्य जगत का अध्ययन करता है, जबकि आत्मा अतीन्द्रिय और अंतर्मुखी चेतना का विषय है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि आत्मा इंद्रियों और मन के विषय से परे (अतीन्द्रिय व अचिंत्य) है। उपनिषदों के अनुसार वाणी और मन इसे पाए बिना लौट आते हैं। इसलिए प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण इसके लिए अपर्याप्त हैं; केवल 'शब्द' (शास्त्र-श्रवण) और ध्यान/अपरोक्षानुभूति ही इसके साक्षात्कार का वास्तविक साधन है।
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