भ. गी. 2.29

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥

अनुवाद

कोई इसे (आत्मा को) आश्चर्यमय मानता है, कोई इसे आश्चर्यमय कहता है, कोई इसे आश्चर्यमय सुनता है, जबकि अन्य व्यक्ति सुनकर भी इसे बिलकुल भी नहीं समझ पाते ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक २.२८ ("अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत...") की व्याख्या में मांडूक्यकारिका एवं श्रीमद्भागवत के सिद्धांत ("आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा") के आधार पर अद्वैत वेदांत और वैष्णव दर्शन के दृष्टिकोण में क्या मुख्य अंतर बताया गया है?

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