भ. गी. 2.28

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥

अनुवाद

हे भरतवंशी ! सभी प्राणी जन्म के पूर्व अप्रकट होते हैं, जन्म और मृत्यु के बीच की अवधि में प्रकट होते हैं तथा मृत्यु के बाद पुनः अप्रकट हो जाते हैं । इस विषय में शोक क्या करना ?

वीडियो व्याख्याएँ देखें

अपनी समझ परखें

प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक २.२८ ("अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत...") की व्याख्या में मांडूक्यकारिका एवं श्रीमद्भागवत के सिद्धांत ("आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा") के आधार पर अद्वैत वेदांत और वैष्णव दर्शन के दृष्टिकोण में क्या मुख्य अंतर बताया गया है?

प्रश्न पूछें

पोस्ट करने के लिए साइन इन करें

अभी कोई प्रश्न नहीं

इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।