भ. गी. 2.3
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥
अनुवाद
हे पार्थ (अर्जुन) ! नपुंसकता को प्राप्त मत हो, यह तुम्हें शोभा नहीं देता । हे शत्रुओं को सन्ताप देने वाले (परन्तप ) ! हृदय की इस क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए उठो ।
हे पार्थ (अर्जुन) ! नपुंसकता को प्राप्त मत हो, यह तुम्हें शोभा नहीं देता । हे शत्रुओं को सन्ताप देने वाले (परन्तप ) ! हृदय की इस क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए उठो ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि यह दुर्बलता विशाल नहीं बल्कि क्षुद्र (छोटी) है। इसके अतिरिक्त, 'परंतप' का आध्यात्मिक अर्थ केवल बाहरी शत्रुओं को मारना नहीं, बल्कि अपने आंतरिक शत्रुओं जैसे शोक, मोह और आसक्ति को जलाकर नष्ट करना भी है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि भगवान ने 'पार्थ' कहकर अर्जुन को उसकी वीर माता कुंती के क्षत्रिय शौर्य की याद दिलाई। साथ ही, इस दुर्बलता को 'क्षुद्र' (तुच्छ) कहा, विशाल नहीं; क्योंकि यह मोह और शोक आत्मा का नित्य स्वभाव नहीं बल्कि बाहर से आया आगंतुक दोष है, जिसे संकल्प और ज्ञान के बल पर दूर किया जा सकता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट कहा गया है कि क्षत्रिय के लिए भिक्षा माँगना निषिद्ध है, सर्वोत्कृष्ट धर्म नहीं। इसके अलावा, भीष्म और द्रोणाचार्य कोई साधारण लालची व्यक्ति नहीं थे; वे परम ज्ञानी और पूजनीय 'महानुभाव' थे, किंतु अर्थ-संबंध के कारण विवश होकर दुर्योधन के साथ खड़े थे।
विकल्प ख (सही): वक्ता के अनुसार, भिक्षा माँगना केवल ब्राह्मणों का धर्म है, क्षत्रिय के लिए यह कर्तव्य-त्याग है। भीष्म जी ने स्वयं स्वीकार किया था कि पुरुष अर्थ का दास हो जाता है; वे दुर्योधन के अन्न/अर्थ से बंधे थे। अर्जुन उन्हें 'महानुभाव' मानते हुए मोहवश उनके अर्थ-बंधन और अधर्म के पक्ष को अनदेखा कर रहा था, जो कि उसकी सतही सोच थी।
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