भ. गी. 2.2

श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥

अनुवाद

श्री भगवान ने कहा – हे अर्जुन ! ऐसे विषम अवसर पर यह मल [विषाद] तुम्हारे* अन्दर कहाँ से उपस्थित हो गया ? यह कुलीन व्यक्ति के लिए अनुचित, स्वर्गप्राप्ति के लिए अनुपयुक्त, और अपकीर्ति की ओर ले जाने वाला है ।

टिप्पणियाँ

* त्व, त्वाम् का वैकल्पिक रूप है; यह युष्मद् (तुम) शब्द का एकवचन द्वितीया-विभक्ति रूप है।

वीडियो व्याख्याएँ देखें

अपनी समझ परखें

प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के अंतिम श्लोक (१.४६) में अर्जुन द्वारा "तन्मे क्षेमतरं भवेत्" (इससे मेरा कल्याण होगा) कहने के पीछे व्याख्यान में अर्जुन की मानसिकता का क्या सूक्ष्म और गहरा विश्लेषण किया गया है?

प्रश्न पूछें

पोस्ट करने के लिए साइन इन करें

अभी कोई प्रश्न नहीं

इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।