श्री भगवान ने कहा – हे अर्जुन ! ऐसे विषम अवसर पर यह मल [विषाद] तुम्हारे* अन्दर कहाँ से उपस्थित हो गया ? यह कुलीन व्यक्ति के लिए अनुचित, स्वर्गप्राप्ति के लिए अनुपयुक्त, और अपकीर्ति की ओर ले जाने वाला है ।
टिप्पणियाँ
* त्व, त्वाम् का वैकल्पिक रूप है; यह युष्मद् (तुम) शब्द का एकवचन द्वितीया-विभक्ति रूप है।
भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के अंतिम श्लोक (१.४६) में अर्जुन द्वारा "तन्मे क्षेमतरं भवेत्" (इससे मेरा कल्याण होगा) कहने के पीछे व्याख्यान में अर्जुन की मानसिकता का क्या सूक्ष्म और गहरा विश्लेषण किया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि अर्जुन का यह भाव निष्काम नहीं था, बल्कि मोह और स्वार्थ से प्रेरित था। वह केवल यह सोच रहा था कि निःशस्त्र होकर मर जाने से उसका स्वयं का कल्याण और प्रायश्चित हो जाएगा।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार, पहले अर्जुन सबके कल्याण ('वयं') की बात कर रहा था, लेकिन अपने अंतिम वचन में वह 'तन्मे' (मेरा कल्याण) कहकर अपने व्यक्तिगत हित की बात करता है। वह सोचता है कि हथियार डालकर निःशस्त्र मर जाने से उसका प्रायश्चित हो जाएगा और उसे अनियत काल तक नरक भोगने से मुक्ति मिल जाएगी।
भगवान श्री कृष्ण द्वारा पूरे प्रथम अध्याय में अर्जुन की बातें शांत रहकर सुनने तथा अध्याय २ के प्रारंभ में "कुतस्त्वा कश्मलमिदं..." (यह मल/मोह कहाँ से आया) पूछने के पीछे क्या गहरा जीवन-दर्शन और मनोवैज्ञानिक रहस्य है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि भगवान अर्जुन की बातों से तनिक भी सहमत नहीं थे। भगवान ने उसके इस मोह को 'कश्मल' (मल/दोष) तथा 'अनार्यजुष्टम्' (श्रेष्ठ पुरुषों के अयोग्य) कहा और उसके इस अनुचित आचरण पर आश्चर्य व्यक्त किया।
विकल्प ख (सही): वक्ता के अनुसार, किसी भ्रमित व्यक्ति को बीच में रोकने के बजाय पूरा सुनने से उसका अहंकार शांत होता है और वह उपदेश ग्रहण करने हेतु तैयार होता है। भगवान द्वारा 'कुतः' (कहाँ से आया) कहना यह दर्शाता है कि यह मोह अर्जुन का मूल स्वभाव नहीं बल्कि बाहरी और अस्थायी (आगंतुक) है, जिसे दूर किया जा सकता है।