भ. गी. 2.37
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥
अनुवाद
यदि तुम [युद्ध करते हुए] मारे गए तो स्वर्ग को प्राप्त करोगे और यदि तुम विजयी हुए तो पृथ्वी का भोग करोगे । अतः हे कुन्तीपुत्र ! युद्ध का दृढ़ निश्चय करके खड़े हो जाओ ।
यदि तुम [युद्ध करते हुए] मारे गए तो स्वर्ग को प्राप्त करोगे और यदि तुम विजयी हुए तो पृथ्वी का भोग करोगे । अतः हे कुन्तीपुत्र ! युद्ध का दृढ़ निश्चय करके खड़े हो जाओ ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार 'अवाच्यवाद' का अर्थ प्रशंसा नहीं बल्कि गालियाँ/अपशब्द हैं। इसके अलावा, जब किसी व्यक्ति में दोष न हो और उस पर झूठा आरोप लगाया जाए (झूठी निंदा), तो उसे अत्यधिक गुस्सा आता है क्योंकि वह जानता है कि आरोप असत्य है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि 'तवाहिताः' (शत्रु) अर्जुन के सामर्थ्य की निंदा करेंगे। अर्जुन डर के मारे युद्ध से पीछे नहीं हट रहा था, इसलिए शत्रुओं द्वारा उसे 'कायर' कहना एक 'झूठी निंदा' होगी। क्षत्रिय स्वभाव के कारण अर्जुन ऐसी अपमानजनक निंदा सहन नहीं कर पाएगा और उसका खून खौल उठेगा।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि भगवान ने अर्जुन को 'कौन्तेय' कहकर याद दिलाया कि उनकी माता कुंती ने यही संदेश भेजा था कि क्षत्रिय पुत्र के लिए पुरुषार्थ का समय आ गया है। श्लोक २.३८ में समता का योग समझाया गया है कि जब व्यक्ति लाभ-हानि व सुख-दुःख की आसक्ति (राग-द्वेष) से ऊपर उठकर निष्काम भाव से कर्तव्य करता है, तो उसे पाप नहीं लगता।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि 'कौन्तेय' सम्बोधन युद्ध के लिए 'कृतनिश्चय' होने की प्रेरणा है, संन्यास की नहीं। इसके अतिरिक्त, अधर्म से कमाए गए धन से किया गया दान कभी पुण्य नहीं दे सकता क्योंकि उसका बीज ही पापपूर्ण होता है।
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