भ. गी. 2.37

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥

अनुवाद

यदि तुम [युद्ध करते हुए] मारे गए तो स्वर्ग को प्राप्त करोगे और यदि तुम विजयी हुए तो पृथ्वी का भोग करोगे । अतः हे कुन्तीपुत्र ! युद्ध का दृढ़ निश्चय करके खड़े हो जाओ ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक २.३६ ("अवाच्यवादांश्च बहून्...") में प्रयुक्त 'अवाच्यवाद' का क्या अर्थ है, तथा 'झूठी निंदा' और 'सच्ची निंदा' के सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर अर्जुन के लिए शत्रुओं की बातें सहना क्यों असंभव बताया गया है?

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