[कर्मयोग के] इस मार्ग पर अर्जित प्रगति का कोई नाश नहीं होता, और न ही विपरीत परिणाम प्राप्त करने की कोई सम्भावना होती है । इस धर्म का थोड़ा सा भी अभ्यास मनुष्य को [जन्म और मृत्यु के चक्र के] महान भय से बचा लेता है ।
व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक २.३९ के अंतर्गत 'सांख्य' और 'कर्मयोग' की क्या विशेषता बताई गई है, तथा नारद जी के दृष्टांत द्वारा कर्म-बंधन से मुक्ति का क्या सूत्र दिया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि सांख्य योग आत्मा और शरीर के भेद व विवेक का ज्ञान है। कर्मयोग में व्यक्ति संसार में कर्म करते हुए भी उनसे अप्रभावित रहकर कर्म-बंधन से मुक्त रहता है। श्री नारद जी के भागवत के श्लोक के अनुसार, जैसे दूध से पेट खराब होने पर वही दूध दही/लस्सी के रूप में पेट ठीक कर देता है, वैसे ही जो कर्म हमें बाँधता है, वही निष्काम व प्रभु-अर्पित होकर हमें बंधन से मुक्त कर देता है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार कर्मयोग में कर्मों का त्याग नहीं किया जाता बल्कि निष्काम भाव से कर्म किया जाता है। इसके अतिरिक्त, सकाम यज्ञ या कर्मकांड फल की आसक्ति के कारण मनुष्य को और अधिक बाँधते हैं, मुक्त नहीं करते।
भगवद्गीता के श्लोक २.४० में वर्णित 'अभिक्रम नाश' न होने तथा 'प्रत्यवाय' (विपरीत परिणाम) न होने का क्या अर्थ और शास्त्रीय उदाहरण दिया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि बुद्धियोग/निष्काम कर्मयोग में किए गए अभ्यास का कभी नाश नहीं होता और न ही इसमें साधक को कोई विपरीत या अनिष्ट फल प्राप्त होता है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि 'अभिक्रम' (आरंभ) का नाश न होने का तात्पर्य है कि साधना का थोड़ा सा भी अंश नष्ट नहीं होता। 'प्रत्यवाय' का अर्थ है विपरीत या उल्टा परिणाम आ जाना। सकाम यज्ञों में मन्त्र या स्वर की त्रुटि से उल्टा फल मिल सकता है (जैसे त्वष्टा ऋषि के यज्ञ में 'इन्द्रशत्रु' मन्त्र के स्वर-भेद से इंद्र को मारने वाले की जगह इंद्र द्वारा मारा जाने वाला वृत्रासुर पैदा हो गया था)। परंतु बुद्धियोग/समत्व योग में कोई प्रत्यवाय (विपरीत फल) नहीं होता।