भ. गी. 2.41
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥
अनुवाद
हे कुरुवंशी, इस पथ पर बुद्धि एक ही लक्ष्य में एकाग्र होकर दृढ़ निश्चय वाली होती है, जबकि जिसका निश्चय नहीं है उसकी बुद्धि के सङ्कल्प असंख्य एवं अनेक शाखाओं में बँटे हुए होते हैं ।
हे कुरुवंशी, इस पथ पर बुद्धि एक ही लक्ष्य में एकाग्र होकर दृढ़ निश्चय वाली होती है, जबकि जिसका निश्चय नहीं है उसकी बुद्धि के सङ्कल्प असंख्य एवं अनेक शाखाओं में बँटे हुए होते हैं ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार संस्कृत में 'व्यवसाय' शब्द का अर्थ व्यापार नहीं बल्कि 'निश्चय' (दृढ़ संकल्प) है। इसके अतिरिक्त अव्यवसायी बुद्धि आध्यात्मिक नहीं बल्कि भोगपरक होती है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि निष्काम कर्मयोग या भक्ति मार्ग में उद्देश्य एक ही (भगवत्प्राप्ति) होने के कारण बुद्धि निश्चयात्मक (व्यवसायात्मिका) रहती है। इसके विपरीत भोग अनेक होने के कारण भोगी व्यक्ति की बुद्धि मन के पीछे चलती है और बहुशाखाओं में बंट जाती है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि 'पुष्पिता वाणी' ऐसे पेड़ के समान है जिसमें फूल तो दिखते हैं पर फल नहीं होता। वेदों में लगभग ९५% कर्मकाण्ड का विधान इसलिए है ताकि भोगी मनुष्यों को नियमों में बाँधकर (जैसे बालक को कड़वी दवा लड्डू में मिलाकर दी जाती है) धीरे-धीरे विषय-भोग से मुक्त किया जा सके।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में 'पुष्पिता वाणी' सकाम कर्मकाण्ड की प्रशंसात्मक वाणी को कहा गया है, उपनिषद के ज्ञानकांड को नहीं। साथ ही, वेदों का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को भोगों में उलझाना नहीं बल्कि भोगों के माध्यम से अनुशासित कर मोक्ष की ओर ले जाना है।
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