भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥
अनुवाद
जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, तथा जिनके चित्त वेद के ऐसे पुष्पित शब्दों से मोहित हैं, उनकी बुद्धि* [परमेश्वर के] समाधि में स्थिर नहीं हो सकती ।
टिप्पणियाँ
* सामान्यतः हम अपने और अपने आसपास के संसार के विषय में प्रमाणिक ज्ञान इंद्रियों के माध्यम से (अर्थात् प्रत्यक्ष द्वारा) अथवा मन के माध्यम से (अर्थात् अनुमान और तर्क द्वारा) प्राप्त करते हैं। किंतु समाधि शब्द, जो पतञ्जलि की शास्त्रीय योग-प्रणाली का एक पारिभाषिक पद है, जानने, बोध करने अथवा जागरूकता की ऐसी अवस्था को व्यक्त करता है जो प्रत्यक्ष और अनुमान से उपलब्ध प्रमाणिक ज्ञान-प्राप्ति की पारंपरिक सीमा से परे है। समाधि मात्र “समाधिस्थ मूर्छा” नहीं है, जिसमें जाग्रत चेतना की सामान्य क्रियाओं का स्थगन निहित हो। समाधि के अनुवाद के रूप में “ज्ञानातीत चेतना” से ठीक-ठीक ऐसी जागरूकता अभिप्रेत है जो सामान्य बोध से परे हो। यहाँ “बोध” शब्द का प्रयोग जानने के सभी पारंपरिक साधनों (प्रमाणों) के सामान्य अर्थ में किया गया है, जिनमें प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमुख हैं। अतः “ज्ञानातीत चेतना” यह बताती है कि समाधि अचेतन अवस्था नहीं, बल्कि अतिचेतन अवस्था है, जिसमें परम सत्य (परमेश्वर) के प्रत्यक्ष अंतर्बोध की संभावना साकार होती है।
व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक २.४४ ("भोगैश्वर्यप्रसक्तानां...") में 'भोग' और 'ऐश्वर्य' को आंतरिक 'गुंडे व डाकू' (लुटेरे) क्यों कहा गया है, तथा मन के एकाग्र होने का क्या मनोवैज्ञानिक नियम बताया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार भोग-ऐश्वर्य निष्काम कर्मयोग का साधन नहीं बल्कि बुद्धि को हरने वाले डाकू हैं। इसके अलावा, वक्ता ने स्पष्ट किया कि मन वास्तव में एक समय में एक ही कार्य में लग सकता है; मल्टीटास्किंग केवल ध्यान का तेजी से इधर-उधर बदलना मात्र है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि बाहरी गुंडे-डाकू तो केवल धन या सामान ले जाते हैं, परंतु भोग और ऐश्वर्य मनुष्य के हृदय व बुद्धि को ही किडनैप (अपहृत) कर लेते हैं। चूँकि मन एक समय में एक ही जगह लग सकता है, अतः जब वह भोगों में डूबा (प्रसक्त) रहता है, तो भगवान में मन लगाने के लिए उपलब्ध ही नहीं रहता।
श्लोक २.४५ ("त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन...") की व्याख्या में वैष्णव आचार्यों (श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर आदि) के अनुसार 'निस्त्रैगुण्य' और 'नित्यसत्त्वस्थ' होने का वास्तविक दार्शनिक अर्थ क्या बताया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि निस्त्रैगुण्य होने का तात्पर्य केवल कर्मकाण्ड छोड़ना नहीं, बल्कि भक्ति में स्थित होना है। इसके अतिरिक्त, 'नित्यसत्त्वस्थ' का अर्थ भौतिक सतोगुण में स्थिर होना नहीं है, क्योंकि भौतिक सतोगुण भी त्रिगुणों के अंतर्गत ही आता है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि वेदों का अधिकांश भाग सकाम कर्म (त्रिगुण) से संबंधित है। आचार्य श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार 'निस्त्रैगुण्य' होने का सच्चा अर्थ भगवद्भक्ति में स्थित होना है। 'नित्यसत्त्वस्थ' में सत्त्व शब्द का अर्थ भौतिक सतोगुण नहीं (क्योंकि वह भी तीन गुणों में आता है), बल्कि त्रिगुणातीत विशुद्ध सत्त्व, परमात्मा या अपने नित्य स्वरूप में स्थित होना है।