भ. गी. 2.44

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥

अनुवाद

जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, तथा जिनके चित्त वेद के ऐसे पुष्पित शब्दों से मोहित हैं, उनकी बुद्धि* [परमेश्वर के] समाधि में स्थिर नहीं हो सकती ।

टिप्पणियाँ

* सामान्यतः हम अपने और अपने आसपास के संसार के विषय में प्रमाणिक ज्ञान इंद्रियों के माध्यम से (अर्थात् प्रत्यक्ष द्वारा) अथवा मन के माध्यम से (अर्थात् अनुमान और तर्क द्वारा) प्राप्त करते हैं। किंतु समाधि शब्द, जो पतञ्जलि की शास्त्रीय योग-प्रणाली का एक पारिभाषिक पद है, जानने, बोध करने अथवा जागरूकता की ऐसी अवस्था को व्यक्त करता है जो प्रत्यक्ष और अनुमान से उपलब्ध प्रमाणिक ज्ञान-प्राप्ति की पारंपरिक सीमा से परे है। समाधि मात्र “समाधिस्थ मूर्छा” नहीं है, जिसमें जाग्रत चेतना की सामान्य क्रियाओं का स्थगन निहित हो। समाधि के अनुवाद के रूप में “ज्ञानातीत चेतना” से ठीक-ठीक ऐसी जागरूकता अभिप्रेत है जो सामान्य बोध से परे हो। यहाँ “बोध” शब्द का प्रयोग जानने के सभी पारंपरिक साधनों (प्रमाणों) के सामान्य अर्थ में किया गया है, जिनमें प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमुख हैं। अतः “ज्ञानातीत चेतना” यह बताती है कि समाधि अचेतन अवस्था नहीं, बल्कि अतिचेतन अवस्था है, जिसमें परम सत्य (परमेश्वर) के प्रत्यक्ष अंतर्बोध की संभावना साकार होती है।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक २.४४ ("भोगैश्वर्यप्रसक्तानां...") में 'भोग' और 'ऐश्वर्य' को आंतरिक 'गुंडे व डाकू' (लुटेरे) क्यों कहा गया है, तथा मन के एकाग्र होने का क्या मनोवैज्ञानिक नियम बताया गया है?

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