हे पार्थ ! अविवेकी लोग जो वेदों में वर्णित अस्थायी लक्ष्यों में आसक्त हैं और यह दावा करते हैं कि वेदों का प्रयोजन इनके अतिरिक्त और कुछ नहीं है, जिनमें भौतिक कामनाएँ भरी हुई हैं और जो स्वर्ग की प्राप्ति का सङ्कल्प रखते हैं, वे भोग और ऐश्वर्य प्राप्ति हेतु वेदों के अनेक विशेष अनुष्ठानों से सम्बन्धित पुष्पित शब्दों का उच्चारण करते हैं, जिनका परिणाम है पुनर्जन्म तथा कर्म चक्र का निरंतर चलते रहना ।
व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक २.४१ में 'व्यवसायात्मिका बुद्धि' और 'अव्यवसायियों की बुद्धि' का क्या सूक्ष्म अर्थ और अंतर बताया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार संस्कृत में 'व्यवसाय' शब्द का अर्थ व्यापार नहीं बल्कि 'निश्चय' (दृढ़ संकल्प) है। इसके अतिरिक्त अव्यवसायी बुद्धि आध्यात्मिक नहीं बल्कि भोगपरक होती है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि निष्काम कर्मयोग या भक्ति मार्ग में उद्देश्य एक ही (भगवत्प्राप्ति) होने के कारण बुद्धि निश्चयात्मक (व्यवसायात्मिका) रहती है। इसके विपरीत भोग अनेक होने के कारण भोगी व्यक्ति की बुद्धि मन के पीछे चलती है और बहुशाखाओं में बंट जाती है।
भगवद्गीता के श्लोक २.४२-४३ में वर्णित 'पुष्पिता वाणी' (आकर्षक वैदिक वचनों) तथा वेदों के कर्मकाण्ड भाग का व्याख्यान में क्या रहस्य उजागर किया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि 'पुष्पिता वाणी' ऐसे पेड़ के समान है जिसमें फूल तो दिखते हैं पर फल नहीं होता। वेदों में लगभग ९५% कर्मकाण्ड का विधान इसलिए है ताकि भोगी मनुष्यों को नियमों में बाँधकर (जैसे बालक को कड़वी दवा लड्डू में मिलाकर दी जाती है) धीरे-धीरे विषय-भोग से मुक्त किया जा सके।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में 'पुष्पिता वाणी' सकाम कर्मकाण्ड की प्रशंसात्मक वाणी को कहा गया है, उपनिषद के ज्ञानकांड को नहीं। साथ ही, वेदों का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को भोगों में उलझाना नहीं बल्कि भोगों के माध्यम से अनुशासित कर मोक्ष की ओर ले जाना है।