छोटे जलाशय से जो उद्देश्य [पूरा हो सकता है], वह एक ही विशाल जलाशय से पूर्णरूप से [प्राप्त हो जाता है] । उसी प्रकार जो उद्देश्य सभी वेदों से प्राप्त करने योग्य है, वह एक आत्म-साक्षात्कारी ब्राह्मण द्वारा पूर्ण हो जाता है।
व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक २.४६ ("यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके...") में 'छोटे जलाशयों' और 'विशाल जलराशि' के दृष्टांत द्वारा वेदों के सकाम कर्मकांड तथा तत्वज्ञानी (विजानतः) पुरुष के संबंध में क्या मुख्य दार्शनिक सिद्धांत समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार तत्वज्ञानी पुरुष को अलग-अलग देवी-देवताओं के सकाम अनुष्ठानों में भटकने की कोई आवश्यकता नहीं रहती। भगवान की शरण ग्रहण करने से व्यक्ति की सभी आवश्यकताएँ पूरी हो जाती हैं और वह व्यर्थ के सकाम कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि जिस प्रकार कुएँ या तालाब जैसे छोटे जलाशयों का प्रयोजन बड़े जलाशय द्वारा पूर्ण हो जाता है, उसी प्रकार वेदों के कर्मकांडीय यज्ञों व देवी-देवताओं की अलग-अलग पूजा से प्राप्त होने वाले सभी फल भगवद्भक्ति में स्थित तत्वज्ञानी पुरुष को एक स्थान पर ही मिल जाते हैं। जिस प्रकार वृक्ष की जड़ में पानी देने से पूरा वृक्ष तृप्त हो जाता है, उसी प्रकार भगवान कृष्ण की भक्ति से सर्व-प्रयोजन स्वतः सिद्ध हो जाते हैं।
व्याख्यान में भगवद्गीता के श्लोक २.४७ ("कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन...") को लोकमान्य तिलक द्वारा 'कर्मयोग की चतुःसूत्री' कहे जाने के आधार पर, कर्म और फल पर मनुष्य के अधिकार व नियंत्रण का क्या वास्तविक अर्थ समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि भगवान 'मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि' कहकर अकर्म (आलस्य या कर्म छोड़ने) का पूर्णतः निषेध करते हैं। इसके अतिरिक्त, फल पर मनुष्य की अपनी स्वतंत्र इच्छा या एकाधिकार नहीं होता।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि इस श्लोक में कर्मयोग के चार सूत्र निहित हैं। मनुष्य वर्तमान में केवल कर्म करने में स्वतंत्र है, जबकि फल भविष्य में प्राप्त होता है और उस पर दैव तथा अन्य ५ कारणों का प्रभाव रहता है, जिससे वह मनुष्य के अपने हाथ में नहीं होता। अतः फल की आसक्ति छोड़े बिना कर्म करने पर ही व्यक्ति चिंतामुक्त होकर पूर्ण एकाग्रता (जैसे अर्जुन द्वारा केवल चिड़िया की आँख देखना या 'फ्लो' अवस्था) के साथ श्रेष्ठ कर्म कर पाता है।