कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
अनुवाद
कर्म* करने तक ही तुम्हारा अधिकार सीमित है, परंतु कभी भी उसके फल पर नहीं । अतः तुम [स्वतन्त्र कर्तापन** का दावा करके] कर्मफल का कारण मत बनो और परिणामस्वरूप कर्म के न करने में भी आसक्त मत हो ।
टिप्पणियाँ
* इसका तात्पर्य है कि व्यक्ति कर्म करने अथवा कर्म से विरत रहने का चुनाव कर सकता है, किंतु अपने कर्मों के फलों के संबंध में उसके पास ऐसा कोई चुनाव नहीं होता।
** फलों का कारण स्वयं को मानने और उनकी इच्छा रखने से व्यक्ति उन फलों के बंधन में पड़ता है।
व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक २.४८ ("योगस्थः कुरु कर्माणि...") में प्रयुक्त सम्बोधन 'धनंजय' तथा 'योग' की विशेष परिभाषा का क्या सूक्ष्म अर्थ समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार केवल बाहरी धन जीतना ही धनंजय का पूर्ण अर्थ नहीं है, बल्कि आंतरिक समता रूपी धन प्राप्त करना असली धनंजय होना है। इसके अतिरिक्त, भगवान यहाँ कर्मों का त्याग करके गुफा में बैठने वाले योग की बात नहीं कर रहे, बल्कि कर्म करते हुए समता में रहने का व्यावहारिक योग सिखा रहे हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि अर्जुन को 'धनंजय' कहकर भगवान आंतरिक समता रूपी धन प्राप्त करने की प्रेरणा देते हैं। इस श्लोक में योग की परिभाषा देते हुए कहा गया है—'समत्वं योग उच्यते', जिसका अर्थ है कि कर्म करते समय फल की सफलता (सिद्धि) या विफलता (असिद्धि) में सम भाव बनाए रखना ही वास्तविक योग है।
व्याख्यान में द्वंदों (राग-द्वेष) से मुक्ति और समता के अनुभव के संदर्भ में न्यूरोसाइंस (मस्तिष्क विज्ञान), सुशुप्ति (गहरी नींद) तथा मादक पदार्थों (ड्रग्स/शराब) का क्या दृष्टांत दिया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि मस्तिष्क के न्यूरॉन्स बार-बार एक ही ढर्रे पर चलने से पगडंडी जैसा सर्किट बना लेते हैं, जिससे समता का अभ्यास आरंभ में नया रास्ता बनाने जैसा कठिन लगता है। सुशुप्ति अवस्था में हमें द्वंद्व-रहित समता का स्वाभाविक आनंद मिलता है। जब लोग तनाव व द्वंद से परेशान होते हैं, तो वे मादक द्रव्यों का विनाशकारी शॉर्टकट चुनते हैं, जबकि भगवान इसके स्वस्थ व वास्तविक समाधान के रूप में कर्मयोग (समता) का उपदेश देते हैं।
विकल्प ख (गलत): यह कथन पूरी तरह असत्य और व्याख्यान के विपरीत है। व्याख्यान में मादक पदार्थों को अत्यंत हानिकारक बताया गया है और सुशुप्ति को आनंददायक तथा मस्तिष्क के न्यूरॉन्स को आदतों से प्रभावित होने वाला बताया गया है।