हे धनञ्जय ! सकाम कर्म वास्तव में इस बुद्धि योग [निष्काम कर्म योग] से अत्यन्त निम्नश्रेणी का है । इस बुद्धि का आश्रय लो । जो फल की कामना से कर्म करते हैं, वे दयनीय हैं ।
व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक २.४९ ("दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय...") में सकाम कर्म को 'अवर' (निकृष्ट) बताने के साथ-साथ फल के लिए कर्म करने वालों को 'कृपण' (कंजूस) क्यों कहा गया है, तथा बृहदारण्यक उपनिषद व हैदराबाद के निजाम का क्या दृष्टांत दिया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार 'कृपण' होने का मुख्य कारण केवल धन दान न करना नहीं है, और न ही निजाम का उदाहरण भौतिक सुख भोगने की प्रेरणा देता है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि 'अवर' शब्द श्रेष्ठ (वर) का विपरीत यानी निकृष्ट है। बृहदारण्यक उपनिषद ("यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वा...") तथा हैदराबाद के निजाम के दृष्टांत से स्पष्ट किया गया है कि अमूल्य मानव जीवन पाकर भी यदि व्यक्ति परमात्मा को न जानकर उसे केवल तुच्छ भौतिक सुखों में व्यर्थ गंवा देता है, तो वह सबसे बड़ा 'कृपण' (कंजूस) है।
श्लोक २.५० ("बुद्धियुक्तो जहातीह उभये सुकृतदुष्कृते... तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्") की व्याख्या के अनुसार, 'सुकृत' और 'दुष्कृत' दोनों को त्यागने का क्या अर्थ है, तथा 'कौशल' (कुशलता) शब्द का क्या व्युत्पत्तिपरक व वास्तविक अर्थ बताया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि पाप और पुण्य दोनों ही जन्म-मरण के बंधन (लोहे व सोने की जंजीर) के कारण हैं, इसलिए बुद्धि योगी दोनों के फल की आसक्ति से परे रहता है। 'कौशल' शब्द 'कुश' घास से आता है—जिस प्रकार बिना हाथ काटे धारदार कुशा को उखाड़ना कुशलता कहलाता है, उसी प्रकार कर्म को इस तरह करना कि वह साधक को बंधन में न डाले और कर्म की जड़ ही कट जाए, यही वास्तविक 'योगः कर्मसु कौशलम्' है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट खंडन किया गया है कि 'कर्मसु कौशलम्' का अर्थ किसी पाप कर्म या घोटाले को सफाई से करना नहीं है, और न ही इसका अर्थ कर्मों का स्वरूप से त्याग करना है।