भ. गी. 2.48
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥
अनुवाद
हे धनञ्जय ! फल की इच्छा का परित्याग करके, सफलता व असफलता में सम रहते हुए, योग में दृढ़ होकर, तुम अपने कर्तव्यों का पालन करो । मन की इस समता को ही योग कहते हैं ।
हे धनञ्जय ! फल की इच्छा का परित्याग करके, सफलता व असफलता में सम रहते हुए, योग में दृढ़ होकर, तुम अपने कर्तव्यों का पालन करो । मन की इस समता को ही योग कहते हैं ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार केवल बाहरी धन जीतना ही धनंजय का पूर्ण अर्थ नहीं है, बल्कि आंतरिक समता रूपी धन प्राप्त करना असली धनंजय होना है। इसके अतिरिक्त, भगवान यहाँ कर्मों का त्याग करके गुफा में बैठने वाले योग की बात नहीं कर रहे, बल्कि कर्म करते हुए समता में रहने का व्यावहारिक योग सिखा रहे हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि अर्जुन को 'धनंजय' कहकर भगवान आंतरिक समता रूपी धन प्राप्त करने की प्रेरणा देते हैं। इस श्लोक में योग की परिभाषा देते हुए कहा गया है—'समत्वं योग उच्यते', जिसका अर्थ है कि कर्म करते समय फल की सफलता (सिद्धि) या विफलता (असिद्धि) में सम भाव बनाए रखना ही वास्तविक योग है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि मस्तिष्क के न्यूरॉन्स बार-बार एक ही ढर्रे पर चलने से पगडंडी जैसा सर्किट बना लेते हैं, जिससे समता का अभ्यास आरंभ में नया रास्ता बनाने जैसा कठिन लगता है। सुशुप्ति अवस्था में हमें द्वंद्व-रहित समता का स्वाभाविक आनंद मिलता है। जब लोग तनाव व द्वंद से परेशान होते हैं, तो वे मादक द्रव्यों का विनाशकारी शॉर्टकट चुनते हैं, जबकि भगवान इसके स्वस्थ व वास्तविक समाधान के रूप में कर्मयोग (समता) का उपदेश देते हैं।
विकल्प ख (गलत): यह कथन पूरी तरह असत्य और व्याख्यान के विपरीत है। व्याख्यान में मादक पदार्थों को अत्यंत हानिकारक बताया गया है और सुशुप्ति को आनंददायक तथा मस्तिष्क के न्यूरॉन्स को आदतों से प्रभावित होने वाला बताया गया है।
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