जो बुद्धिमान व्यक्ति इस [निष्काम कर्मयोग] के ज्ञान से युक्त होते हैं, वे अपने कर्मों से उत्पन्न फलों का परित्याग करके जन्म के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं एवं समस्त दुःखों से परे पद को प्राप्त करते हैं ।
भगवद्गीता के श्लोक २.५१ ("कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः...") के आधार पर 'अनामय पद' तथा बुद्धिमान साधक द्वारा 'फलं त्यक्त्वा' (फल के त्याग) का क्या वास्तविक अर्थ व्याख्यान में समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार 'अनामय पद' भौतिक संसार का कोई पद नहीं है। इसके अलावा, फल-त्याग का अर्थ स्वास्थ्य या आनंद को त्यागना नहीं, बल्कि फल से जुड़ी मानसिक आसक्ति का त्याग है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि संस्कृत में 'आम' का अर्थ रोग या कष्ट होता है; अतः 'अनामय पद' का अर्थ समस्त भौतिक दुखों व विकारों से रहित भगवद्-धाम है। बुद्धिमान (मनीषी) जन कर्मफल के आने पर उसमें आसक्त नहीं होते, बल्कि उसे प्रभु की कृपा मानते हैं।
श्लोक २.५२ ("यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति...") में प्रयुक्त शब्द 'कलिल' तथा 'यदा-तदा' के प्रयोग से वैराग्य ('निर्वेद') प्राप्त होने की कौन सी विशेष स्थिति बताई गई है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में 'कलिल' को अंधकार व दलदल बताया गया है, न कि निर्मल मार्ग। इसके अतिरिक्त मोह छूटने और वैराग्य मिलने के बीच कोई समय का अंतर (विलंब) नहीं होता।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि 'कलिल' का शाब्दिक अर्थ दलदल है जहाँ प्रयास करने पर व्यक्ति और अधिक डूबता जाता है। 'यदा' (जब) और 'तदा' (तब) का प्रयोग यह सिद्ध करता है कि जैसे ही बुद्धि मोह से बाहर निकलती है, उसी क्षण (तत्काल) व्यक्ति सुने हुए और सुनने योग्य भोगों से विरक्त (निर्वेद) हो जाता है।