श्री भगवान् ने कहा – हे पार्थ ! जब व्यक्ति मन की समस्त तृष्णाओं को पूर्णतः त्याग देता है और आत्मा के स्वाभाविक आनंद से केवल आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थिर बुद्धि वाला कहा जाता है ।
व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक २.५५ ("प्रजहाति यदा कामान्...") में 'मनोगतान्' विशेषण द्वारा कामनाओं का क्या दार्शनिक स्वरूप समझाया गया है, तथा राजा ययाति के दृष्टांत से क्या मुख्य शिक्षा मिलती है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार कामनाएँ आत्मा का धर्म नहीं हैं; यदि ये आत्मा का स्वाभाविक स्वरूप होतीं तो इन्हें कभी छोड़ा ही नहीं जा सकता था। इसके अतिरिक्त, राजा ययाति ने एक हजार वर्षों तक भोग करने के बाद भी अपनी कामनाओं को शांत नहीं पाया।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि भगवान ने कामनाओं के लिए 'मनोगतान्' शब्द का प्रयोग किया है, जिसका अर्थ है कि ये मन के धर्म हैं और मन में आती-जाती रहती हैं। आत्मा इनसे पृथक है, इसलिए इन्हें पकड़ा या छोड़ा जा सकता है। राजा ययाति के आख्यान ("न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति...") से सिद्ध होता है कि विषयों के उपभोग से तृष्णा कभी शांत नहीं होती, जैसे आग में लकड़ी डालने से आग और भड़कती है।
श्लोक २.५६ ("दुःखेष््वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः...") की व्याख्या में भगवान द्वारा 'सुख की स्पृहा' (लालसा) न करने का क्या सूक्ष्म कारण बताया गया है (हितोपदेश का दृष्टांत), तथा राग, भय और क्रोध का आयुर्वेद के त्रिदोषों से क्या संबंध दर्शाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि जिस रास्ते से सुख आता है, दुःख भी उसी के पीछे-पीछे छाया की तरह चला आता है। हितोपदेश के दृष्टांत में यात्री सोने के कड़े (सुख) के लालच में गया और बूढ़े चीते के पंजे (दुःख/मृत्यु) में फँस गया। इसी प्रकार, मानसिक विकारों का शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है—क्रोध से पित्त बढ़ता है, भय से वात (वायु) कुपित होता है और राग से कफ बढ़ता है।
विकल्प ख (गलत): विकल्प ख में आयुर्वेद के त्रिदोषों (वात, पित्त, कफ) का राग, भय और क्रोध के साथ संबंध विपरीत/गलत दिया गया है।