अर्जुन उवाच स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥
अनुवाद
अर्जुन ने पूछा – हे केशव ! जिस [ईश्वर-साक्षात्कार प्राप्त] व्यक्ति की बुद्धि दृढता से स्थिर है, और जो समाधि में स्थित है, उसके लक्षण क्या हैं ? स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, और कैसे चलता है ?
व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक २.५३ में प्रयुक्त शब्द 'श्रुतिविप्रतिपन्ना' का व्युत्पत्तिपरक अर्थ क्या है, तथा बुद्धि में स्थिरता लाने के संदर्भ में 'विक्षेप' और 'लय' का क्या दार्शनिक रहस्य समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार 'श्रुतिविप्रतिपन्ना' का संबंध केवल पाठ न करने से नहीं बल्कि विरोधी वचनों को सुनकर बुद्धि में संशय आने से है। इसके अतिरिक्त, अज्ञान, नींद या मादक द्रव्यों से होने वाली निष्क्रियता तामसिक है, वह समाधि या वास्तविक अचलता नहीं है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि 'पद गतौ' धातु में 'वि' और 'प्रति' उपसर्ग लगने से 'विप्रतिपन्ना' बनता है, जिसका अर्थ है विरोधी वचनों को सुनकर भ्रम व संशय में पड़ जाना। मन में दो प्रकार की अनिश्चितता होती है—'विक्षेप' (एक विषय से दूसरे में भटकना) और 'लय' (अज्ञान/सुशुप्ति में चले जाना)। समाधि में बुद्धि की अचलता अज्ञान या नींद की निष्क्रियता नहीं, बल्कि पूर्ण जागरूकता व ज्ञान के प्रकाश में स्थित होना है।
भगवद्गीता के श्लोक २.५४ ("स्थितप्रज्ञस्य का भाषा...") की व्याख्या में अर्जुन द्वारा पूछे गए चार प्रश्नों तथा किसी व्यक्ति या परमेश्वर को पहचानने के लिए 'स्वरूप लक्षण' और 'तटस्थ लक्षण' का क्या शास्त्रीय महत्त्व बताया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि यहाँ 'भाषा' का अर्थ हिंदी, तमिल या संस्कृत जैसी भाषा नहीं बल्कि 'लक्षण/परिभाषा' है। इसके अतिरिक्त, आसीत और व्रजेत का अर्थ केवल शारीरिक रूप से बैठने या तेज-धीरे चलने से नहीं बल्कि व्यावहारिक जीवनशैली और आचरण से है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि 'भाष्यते अनेन इति भाषा' अर्थात जिससे किसी वस्तु की परिभाषा या पहचान (लक्षण) व्यक्त हो। अर्जुन के चार प्रश्न स्थितप्रज्ञ के लक्षण, उसकी वाणी, एकांत की जीवनशैली और समाज में उसके व्यवहार/कार्यशैली को जानने के लिए हैं। शास्त्र में दो लक्षण बताए गए हैं—स्वरूप लक्षण (आंतरिक निज रूप) और तटस्थ लक्षण (बाह्य अभिव्यक्ति/गुण-धर्म)। तटस्थ लक्षण से ही किसी वस्तु या परमेश्वर का प्रांरभिक बोध होता है।