न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥
अनुवाद
और हम नहीं जानते कि हमारे लिए क्या बेहतर होगा — उनपर विजय प्राप्त करना या उनका हमपर विजय प्राप्त करना ? वही धृतराष्ट्र के पुत्र, जिनकी हत्या करके हम हम जीना नहीं चाहेंगे, वे आज सीधे हमारे सामने खड़े हैं ।
व्याख्यान में वर्णित उपनिषद के नियम तथा 'याज्ञवल्क्य ऋषि' की परिभाषा के अनुसार, अध्यात्म में वास्तविक 'कृपणता' (कंजूसी) का गहरा अर्थ क्या है, और मनुष्य जीवन में इसका क्या स्वरूप दिखाई देता है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार केवल धन न खर्च करना कंजूसी की बहुत छोटी परिभाषा है, और भौतिक सुखों में जीवन नष्ट करना 'श्रेय' नहीं बल्कि कृपणता है। शास्त्रों में अपने सामर्थ्य व मानव जीवन के समय को अध्यात्म में न लगाने वाले को कृपण कहा गया है।
विकल्प ख (सही): वक्ता याज्ञवल्क्य ऋषि के कथन के आधार पर समझाते हैं कि जो व्यक्ति इस नश्वर संसार से बिना आत्मा व परमात्मा का ज्ञान प्राप्त किए चला जाता है, वही सच्चा 'कृपण' (कंजूस) है। मानव शरीर अत्यंत दुर्लभ धन है; इसका उपयोग अत्यंतिक सुख (मुक्ति) पाने के बजाय कॉटन कैंडी (बुढ़िया के बाल) की भाँति सारहीन भौतिक विषयों में समय नष्ट करने के लिए करना ही वास्तविक कृपणता है।
व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक २.७ में अर्जुन द्वारा भगवान श्री कृष्ण से यह न पूछकर कि "मैं युद्ध करूँ या न करूँ", यह पूछना कि "मेरा 'श्रेय' किसमें है" किस सूक्ष्म दार्शनिक परिपक्वता को दर्शाता है, और 'श्रेय' तथा 'प्रेय' में क्या अंतर है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि साधारण लोग केवल तात्कालिक व्यावहारिक प्रश्न (जैसे व्यापार या नौकरी करें या नहीं) पूछते हैं, किंतु अर्जुन ने परिपक्वता दिखाते हुए 'श्रेय' (अत्यंतिक कल्याण) पूछा। 'प्रेय' केवल क्षणिक भौतिक तरक्की है जिसका अंत दुःख में होता है, जबकि 'श्रेय' वह मूल ज्ञान है जिसे जान लेने पर जीवन के सारे संशय और कर्तव्य स्वतः स्पष्ट हो जाते हैं।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार अर्जुन राज्य पाने का शॉर्टकट नहीं पूछ रहा था, बल्कि अपने भ्रम और कार्पण्य दोष से मुक्ति के लिए परम कल्याण का मार्ग पूछ रहा था। साथ ही, 'प्रेय' का अर्थ तात्कालिक भौतिक आकर्षण है, स्थायी आध्यात्मिक कल्याण 'श्रेय' कहलाता है।