भ. गी. 2.6

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥

अनुवाद

और हम नहीं जानते कि हमारे लिए क्या बेहतर होगा — उनपर विजय प्राप्त करना या उनका हमपर विजय प्राप्त करना ? वही धृतराष्ट्र के पुत्र, जिनकी हत्या करके हम हम जीना नहीं चाहेंगे, वे आज सीधे हमारे सामने खड़े हैं ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान में वर्णित उपनिषद के नियम तथा 'याज्ञवल्क्य ऋषि' की परिभाषा के अनुसार, अध्यात्म में वास्तविक 'कृपणता' (कंजूसी) का गहरा अर्थ क्या है, और मनुष्य जीवन में इसका क्या स्वरूप दिखाई देता है?

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