मेरा स्वभाव हृदय की दुर्बलता के दोष से वशीभूत हो गया है और मेरा मन अपने धर्म को लेकर भ्रमित हो गया है । मैं आपसे पूछता हूँ कि आप कृपया मुझे निश्चित रूप से बताएँ कि कौन सा कार्य मेरे लिए सबसे कल्याणकारी है । मैं आपका शिष्य हूँ और मैं आपकी शरण में आया हूँ । कृपया मुझे शिक्षा दीजिए ।
व्याख्यान में भगवद्गीता के श्लोक २.७ ("कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः...") के आधार पर 'कार्पण्य दोष' (कृपणता) और 'धर्मसंमूढचेता' का क्या वास्तविक अर्थ समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि यहाँ कृपणता का अर्थ धन संबंधी कंजूसी से नहीं है, बल्कि मानव जीवन पाकर भी अपनी चेतना को परमात्मा की ओर न लगाकर सांसारिक मोह में फँसाए रखना है। चित्त में अज्ञान छा जाने से व्यक्ति 'धर्मसंमूढचेता' हो जाता है, जिससे उसे सही और गलत का बोध नहीं रह पाता।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार 'कार्पण्य दोष' धन बचाने का लालच नहीं है, और न ही 'धर्मसंमूढचेता' किसी ज्ञानी निर्णय को कहते हैं; यह चित्त की भ्रमित और मोहित अवस्था का प्रतीक है।
व्याख्यान के अनुसार, 'प्रेय' और 'श्रेय' के मार्गों में क्या मुख्य अंतर है, और स्वयं के केवल तर्क या प्रयास से आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त न हो पाने का क्या दार्शनिक कारण बताया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि प्रेय मार्ग केवल तात्कालिक भौतिक सुख देता है जो विघ्नों से घिरा रहता है, जबकि श्रेय मार्ग आत्यंतिक कल्याण की ओर ले जाता है। चूँकि मनुष्य का चित्त भौतिक है, इसलिए उससे स्वयं अध्यात्म नहीं निकल सकता; उपनिषदों के अनुसार केवल तर्क से मति स्थिर नहीं होती (तर्काप्रतिष्ठानात्), इसलिए शास्त्रज्ञ व ब्रह्मनिष्ठ गुरु की शरणागति ही श्रेय का साधन है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट कहा गया है कि प्रेय मार्ग से मोक्ष नहीं मिलता और केवल अपने तर्क से आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना असंभव है; गुरु की शरणागति के बिना आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं है।