भ. गी. 2.62
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥
अनुवाद
इंद्रियविषयों का चिंतन करने से व्यक्ति में उनके प्रति आसक्ति उत्पन्न हो जाती है । आसक्ति से इच्छा उत्पन्न हो जाती है और [अतृप्त] इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है ।
इंद्रियविषयों का चिंतन करने से व्यक्ति में उनके प्रति आसक्ति उत्पन्न हो जाती है । आसक्ति से इच्छा उत्पन्न हो जाती है और [अतृप्त] इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार "सुंदर" कहना केवल एक तटस्थ शब्द नहीं है, बल्कि उसके पीछे सूक्ष्म स्तर पर राग की तरंग छिपी होती है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि जब हम किसी वस्तु को 'सुंदर' कहते हैं, तो सूक्ष्म स्तर पर हमारा राग ही उसे सुंदर रूप में देखता है। यह विचार चित्त में यह संस्कार अंकित करता है कि "यह वस्तु अच्छी है", जिसका अर्थ है "मैं इसे प्राप्त करना चाहता हूँ"। यहीं से विषय-ध्यान, आसक्ति और फिर कामना का सूक्ष्म सिलसिला आरंभ होता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि काम में अवरोध आने पर क्रोध उत्पन्न होता है, जो चित्त में 'सम्मोह' (वस्तुओं को वैसा न देख पाना जैसी वे हैं) पैदा करता है। स्मृति वस्तु को यथार्थ रूप में पहचानती है, किंतु सम्मोह के कारण 'स्मृति विभ्रम' हो जाता है। चूँकि बुद्धि स्मृति की सहायता से ही सही व गलत का विवेक करती है, इसलिए स्मृति नष्ट होने से बुद्धि (विवेक) नष्ट हो जाती है और मनुष्य मानव जीवन के परम लक्ष्य से च्युत होकर विनष्ट हो जाता है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार सम्मोह स्मृति को तीक्ष्ण नहीं बल्कि विकृत (विभ्रम) करता है, जिससे बुद्धि का नाश होता है न कि मोक्ष की प्राप्ति।
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