जो योगी मेरे साथ [भक्ति में] युक्त है और केवल मेरा परायण है, उसे अपनी सभी इंद्रियों को संयमित करके बैठना चाहिये । जिसकी इंद्रियाँ वश में हैं, वह निःसंदेह स्थिर बुद्धि वाला होता है ।
व्याख्यान में भगवद्गीता के श्लोक २.६१ ("तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः...") के अंतर्गत 'मत्परः' (मेरे परायण) शब्द का क्या सूक्ष्म दार्शनिक अर्थ बताया गया है, और केवल अपने 'अहंकार' या बुद्धि के बल पर इंद्रियों को वश में न कर पाने का क्या मूल कारण दिया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि केवल अहंकार के बल पर चलने से व्यक्ति का नियंत्रण कभी भी टूट सकता है, और मन व इंद्रियाँ त्रिगुणात्मक भौतिक तत्व हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि साधारण जीवन में मनुष्य 'अहम परायण' (अपने अहंकार के वश में) रहता है। मन, बुद्धि और इंद्रियाँ स्वयं भौतिक व तीन गुणों (सत्, रज, तम) से बनी हैं। जिस प्रकार उसी जीवाणु से दूषित औषधि रोग ठीक नहीं कर सकती, उसी प्रकार त्रिगुणात्मक साधनों का प्रयोग करके मनुष्य स्वयं त्रिगुण के पार नहीं जा सकता। केवल भगवान ही त्रिगुणातीत हैं, इसलिए 'मत्परः' होकर उनकी शरण लेने से ही इंद्रियों पर स्थायी नियंत्रण प्राप्त होता है।
व्याख्यान के अनुसार, श्लोक २.६१ की व्याख्या में श्रीमद्भागवत के ११वें स्कंध (उद्धव संवाद) तथा चरक संहिता के नियम ("हितं भुञ्जीत...") के आधार पर साधन-काल में इंद्रियों और विषयों के व्यवहार हेतु क्या व्यावहारिक निर्देश दिए गए हैं?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह कथन व्याख्यान के पूर्णतः विपरीत है, जहाँ विषयों को परिणाम में केवल दुख का कारण बताया गया है और चरक संहिता का नियम सीमित व हितकारी आहार लेने का है।
विकल्प ख (सही): वक्ता श्रीमद्भागवत (११वें स्कंध) का उद्धरण देते हैं कि यदि साधक विषय छोड़ने में अनिश्वर (असमर्थ) हो, तो भी उसे विषयों को 'दुखात्मक' और परिणाम में दुख देने वाला मानकर तथा उनकी निंदा करते हुए निष्काम भजन में लगे रहना चाहिए। इसके साथ ही चरक संहिता का सिद्धांत बताया गया है कि आहार हितकारी (स्वास्थ्यप्रद), सीमित (मितम्) तथा प्रिय (इष्टम्) होना चाहिए, परंतु हितकारी वस्तु भी क्षमता से अधिक (अमितम्) नहीं खानी चाहिए।