भ. गी. 2.65
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥
अनुवाद
जब व्यक्ति को मन की शान्ति प्राप्त हो जाती है तब उसके सभी दुःख नष्ट हो जाते हैं । जिसका मन शान्त है, उसकी बुद्धि निश्चित रुप से अति शीघ्र [ईश्वर में] दृढता से स्थित हो जाती है ।
जब व्यक्ति को मन की शान्ति प्राप्त हो जाती है तब उसके सभी दुःख नष्ट हो जाते हैं । जिसका मन शान्त है, उसकी बुद्धि निश्चित रुप से अति शीघ्र [ईश्वर में] दृढता से स्थित हो जाती है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार 'विधेयात्मा' वह है जिसका मन और इंद्रियाँ उसकी आज्ञा के अनुसार चलती हैं। जब ऐसा साधक राग और द्वेष से रहित होकर विषयों में विचरता है, तो उसे 'प्रसाद' मिलता है। वक्ता ने स्पष्ट किया कि 'प्रसाद' शब्द के तीन गहरा अर्थ हैं—प्रसन्नता, मन की निर्मलता (मल-रहितता) और भगवान की अहैतुकी कृपा।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट कहा गया है कि धन और पद मिलने से मन की प्रसन्नता नहीं मिलती। इसके अतिरिक्त प्रसाद का तात्पर्य केवल भौतिक खाद्य पदार्थ तक सीमित नहीं है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार प्रसाद मिलने का अर्थ बाह्य स्थितियों का अचानक बदल जाना नहीं है, बल्कि मन का उन स्थितियों से अप्रभावित और शांत रहना है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि बाह्य परिस्थितियाँ चाहे जो हों, दुःख की अंतिम अनुभूति हमारे मन में ही होती है। जब मन निर्मल और शांत (प्रसन्न-चित्त) हो जाता है, तो दुःख प्रभावहीन हो जाते हैं और बुद्धि स्थिर हो जाती है। भागवत के रूपक में दक्ष की पुत्री 'शांति' है और शांति का पुत्र 'सुख' है—अर्थात् वास्तविक कार्य-कुशलता (दक्षता) शांति पैदा करती है और शांति से ही सुख की उत्पत्ति होती है।
इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।