भ. गी. 2.65

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥

अनुवाद

जब व्यक्ति को मन की शान्ति प्राप्त हो जाती है तब उसके सभी दुःख नष्ट हो जाते हैं । जिसका मन शान्त है, उसकी बुद्धि निश्चित रुप से अति शीघ्र [ईश्वर में] दृढता से स्थित हो जाती है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक २.६४ ("रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्...") की व्याख्या के अनुसार, 'विधेयात्मा' साधक राग और द्वेष से मुक्त होकर इंद्रिय विषयों का आचरण करते हुए भी क्या प्राप्त करता है, तथा व्याख्यान में 'प्रसाद' शब्द के कौन से तीन अर्थ बताए गए हैं?

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