नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥
अनुवाद
जिस व्यक्ति का मन और इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, वह उचित विवेक विकसित नहीं कर सकता और न ही वह ईश्वर के प्रति सचेत* हो सकता है । जो ईश्वर के प्रति सचेत नहीं है, वह शान्ति प्राप्त नहीं कर सकता और मन की शान्ति के बिना कोई व्यक्ति सच्चा सुख कैसे प्राप्त कर सकता है ?
टिप्पणियाँ
* भावना शब्द का अर्थ जागरूकता अथवा मन की एकाग्रता है। यहाँ इसका अर्थ भगवद्-चेतना लिया गया है।
भगवद्गीता के श्लोक २.६६ ("नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना...") में भगवान श्री कृष्ण द्वारा परम सुख प्राप्त न होने का क्या क्रमबद्ध कारण समझाया गया है, तथा आज के परिप्रेक्ष्य में 'अयुक्त' व्यक्ति की स्थिति की व्याख्यान में क्या उपमा दी गई है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि भगवान यहाँ दुःख और अशांति का पूरा क्रम बताते हैं—अयुक्त (असंयमित/ईश्वर से विमुख) व्यक्ति में स्थिर बुद्धि नहीं होती, बुद्धि न होने से भक्ति/भावना नहीं होती, और बिना भावना के मन चंचल व अशांत रहता है। अशांत मन को सुख मिलना असंभव है। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में अयुक्त व्यक्ति उस 'कटी पतंग' की भाँति है जिसकी डोरी कट चुकी है और वह सोशल मीडिया व तकनीक के जंगल में भटक रहा है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार अयुक्त व्यक्ति में बुद्धि और भावना दोनों का अभाव होता है; अतः विकल्प ख का दावा असत्य है।
भगवद्गीता के श्लोक २.६७ ("इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥") की व्याख्या में प्रयुक्त 'नौका और वायु' के दृष्टांत में जल, वायु, नौका और सारथी का क्या दार्शनिक अर्थ दर्शाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है और श्लोक के वास्तविक रूपक से मेल नहीं खाती।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि जिस प्रकार जल में बिना नाविक/सारथी के चल रही नौका को प्रचंड वायु किसी भी दिशा में बहा ले जाती है, उसी प्रकार विषयों में चरती हुई इंद्रियाँ (वायु) चंचल मन (जल) के माध्यम से मनुष्य की बुद्धि/प्रज्ञा (नौका) का हरण कर लेती हैं। यदि सारथी लगाम छोड़ दे, तो इंद्रिय रूपी अनियंत्रित घोड़े पूरे रथ को दुर्घटनाग्रस्त कर देते हैं।