भ. गी. 3.11

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥

अनुवाद

[ ब्रह्मा आगे कहते हैं - ] “इस यज्ञ के द्वारा देवताओं का पोषण करो, और [ ऐसा करने से ] देवता तुम पर कृपा करें । इस प्रकार पारस्परिक परोपकार के द्वारा तुम सर्वोच्च कल्याण प्राप्त करोगे ।”

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ३.१० ("सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः...") में 'प्रजा' शब्द के अर्थ तथा 'अधिकार' (Right) और 'कर्तव्य' (Duty) के संबंध में क्या मुख्य व्यावहारिक व दार्शनिक सिद्धांत समझाया गया है?

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