भ. गी. 3.11
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥
अनुवाद
[ ब्रह्मा आगे कहते हैं - ] “इस यज्ञ के द्वारा देवताओं का पोषण करो, और [ ऐसा करने से ] देवता तुम पर कृपा करें । इस प्रकार पारस्परिक परोपकार के द्वारा तुम सर्वोच्च कल्याण प्राप्त करोगे ।”
[ ब्रह्मा आगे कहते हैं - ] “इस यज्ञ के द्वारा देवताओं का पोषण करो, और [ ऐसा करने से ] देवता तुम पर कृपा करें । इस प्रकार पारस्परिक परोपकार के द्वारा तुम सर्वोच्च कल्याण प्राप्त करोगे ।”
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार पशु-पक्षी संकल्पपूर्वक शास्त्र-विहित यज्ञ नहीं करते। इसके अतिरिक्त केवल अधिकार की बात करना और कर्तव्य न निभाना ही समाज में अव्यवस्था, असंतुलन और भ्रष्टाचार का मूल कारण है [13–15]।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि यद्यपि जन्म लेने वाले सभी जीव प्रजा हैं, किंतु यहाँ 'प्रजा' का अर्थ 'मनुष्य मात्र' से है क्योंकि केवल मनुष्य के पास ही यज्ञ व धर्म-आचरण की क्षमता है। इसके अलावा, वक्ता आधुनिक 'फंडामेंटल राइट्स' की केवल अधिकार माँगने की प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाते हुए समझाते हैं कि अधिकार कभी बिना कर्तव्य के नहीं मिलता—जब किसी को कोई उत्तरदायित्व या कर्तव्य सौंपा जाता है, तभी उसे उस संदर्भ में अधिकार प्राप्त होता है [11–13]।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता श्लोक ३.१० के 'इष्टकामधुक्' और श्लोक ३.११ के 'परं श्रेयः' को जोड़ते हुए बताते हैं कि वैशेषिक सूत्र के अनुसार जिससे अभ्युदय (भौतिक समृद्धि) और निःश्रेयस (आध्यात्मिक परम कल्याण) दोनों सिद्ध हों, वही वास्तविक धर्म है [24–25]। भगवदर्पण बुद्धि से किए गए निष्काम यज्ञ से जीवन की आवश्यकताओं की स्वाभाविक पूर्ति के साथ-साथ परम श्रेय (मोक्ष/भगवत्प्राप्ति) की सिद्धि भी होती है [25–26]।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि यज्ञ का तात्पर्य केवल संकुचित भौतिक फल पाना नहीं है, बल्कि कर्तव्य-पालन और परस्पर सहयोग से परम श्रेय (मोक्ष) तक पहुँचना है [24–26]।
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