सृष्टि के आरम्भ में जब ब्रह्मा ने यज्ञ* के सहित मानवजाति की सृष्टि की तब उन्होंने कहा, “इस यज्ञ से तुम समृद्ध होगे । यह तुम्हारी सभी इच्छित कामनाओं को पूर्ण करने वाला हो ।”
टिप्पणियाँ
* यज्ञ को सामान्यतः देवताओं को प्रसन्न करने वाला वैदिक अनुष्ठान समझा जाता है। ऐसे अनुष्ठान में अग्नि में आहुतियाँ दी जाती हैं और मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। यज्ञ भगवान् विष्णु का भी एक नाम है, जो यज्ञ-कर्मों के परम भोक्ता हैं। वेदों का कथन है—यज्ञो वै विष्णुः, अर्थात् “यज्ञ वास्तव में विष्णु हैं।” इस अर्थ की पुष्टि श्लोक 15 और 3 से भी होती है।
व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ३.१० ("सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः...") में 'प्रजा' शब्द के अर्थ तथा 'अधिकार' (Right) और 'कर्तव्य' (Duty) के संबंध में क्या मुख्य व्यावहारिक व दार्शनिक सिद्धांत समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार पशु-पक्षी संकल्पपूर्वक शास्त्र-विहित यज्ञ नहीं करते। इसके अतिरिक्त केवल अधिकार की बात करना और कर्तव्य न निभाना ही समाज में अव्यवस्था, असंतुलन और भ्रष्टाचार का मूल कारण है [13–15]।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि यद्यपि जन्म लेने वाले सभी जीव प्रजा हैं, किंतु यहाँ 'प्रजा' का अर्थ 'मनुष्य मात्र' से है क्योंकि केवल मनुष्य के पास ही यज्ञ व धर्म-आचरण की क्षमता है। इसके अलावा, वक्ता आधुनिक 'फंडामेंटल राइट्स' की केवल अधिकार माँगने की प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाते हुए समझाते हैं कि अधिकार कभी बिना कर्तव्य के नहीं मिलता—जब किसी को कोई उत्तरदायित्व या कर्तव्य सौंपा जाता है, तभी उसे उस संदर्भ में अधिकार प्राप्त होता है [11–13]।
भगवद्गीता के श्लोक ३.११ ("देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥") के अनुसार, 'इष्टकामधुक्' और 'परं श्रेयः' का क्या समन्वयात्मक अर्थ समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता श्लोक ३.१० के 'इष्टकामधुक्' और श्लोक ३.११ के 'परं श्रेयः' को जोड़ते हुए बताते हैं कि वैशेषिक सूत्र के अनुसार जिससे अभ्युदय (भौतिक समृद्धि) और निःश्रेयस (आध्यात्मिक परम कल्याण) दोनों सिद्ध हों, वही वास्तविक धर्म है [24–25]। भगवदर्पण बुद्धि से किए गए निष्काम यज्ञ से जीवन की आवश्यकताओं की स्वाभाविक पूर्ति के साथ-साथ परम श्रेय (मोक्ष/भगवत्प्राप्ति) की सिद्धि भी होती है [25–26]।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि यज्ञ का तात्पर्य केवल संकुचित भौतिक फल पाना नहीं है, बल्कि कर्तव्य-पालन और परस्पर सहयोग से परम श्रेय (मोक्ष) तक पहुँचना है [24–26]।