भ. गी. 3.15

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥

अनुवाद

यह जान लो कि नियत कर्म का उद्भव वेदों से होता है और वेद अविनाशी (परब्रह्म) से प्रकट होते हैं। अतएव सर्वव्यापक ब्रह्म (अर्थात परब्रह्म) यज्ञ में नित्य विद्यमान रहता है।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ३.१४ व ३.१५ ("अन्नाद्भवन्ति भूतानि... कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि") की व्याख्या के अनुसार, वेदों को 'अपौरुषेय' (अक्षर समुद्भव) बताने का क्या अर्थ है तथा मानव निर्मित कृतियों और वेदों में क्या मूलभूत अंतर दर्शाया गया है?

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