भ. गी. 3.15
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥
अनुवाद
यह जान लो कि नियत कर्म का उद्भव वेदों से होता है और वेद अविनाशी (परब्रह्म) से प्रकट होते हैं। अतएव सर्वव्यापक ब्रह्म (अर्थात परब्रह्म) यज्ञ में नित्य विद्यमान रहता है।
यह जान लो कि नियत कर्म का उद्भव वेदों से होता है और वेद अविनाशी (परब्रह्म) से प्रकट होते हैं। अतएव सर्वव्यापक ब्रह्म (अर्थात परब्रह्म) यज्ञ में नित्य विद्यमान रहता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बृहदारण्यक उपनिषद ("अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतत्...") का उद्धरण देकर समझाते हैं कि वेद भगवान की स्वाभाविक श्वास की भाँति नित्य प्रकट हुए हैं। चूँकि इनका कोई त्रुटिपूर्ण कर्ता नहीं है और भगवान आप्तकाम हैं, इसलिए वेदों में मनुष्यों के ४ दोष (भ्रम, प्रमाद, करणपाटव, विप्रलिप्सा) नहीं होते और ये विशुद्ध जनकल्याण के लिए हैं।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि वेद किसी साधारण मनुष्य की स्वार्थी रचना नहीं हैं, बल्कि ये भगवान से प्रकट निर्दोष एवं नित्य ज्ञान हैं।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह अर्थ पूर्णतः असत्य और श्लोक के विपरीत है। व्याख्यान में 'अघ' का अर्थ पाप/कष्ट और 'इन्द्रियाराम' का अर्थ केवल इंद्रिय-सुख में डूबे रहने वाला बताया गया है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि 'अघ' का अर्थ पाप या कष्ट है, अतः 'अघायु' वह है जिसका जीवन पाप से भरा हो और जो समाज व प्रकृति को कष्ट दे। संस्कृत में 'आराम' का शाब्दिक अर्थ बगीचा (उपवन) होता है; अतः 'इन्द्रियाराम' का अर्थ है जिसकी बुद्धि अपनी इंद्रियों के बगीचे से आगे नहीं सोचती। जो व्यक्ति सृष्टि-चक्र का अनुवर्तन नहीं करता, उसका जीवन व्यर्थ ('मोघम्') है।
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