भ. गी. 3.16

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥

अनुवाद

हे अर्जुन ! जो वर्णित तरीके से प्रवर्तित इस सृजनात्मक चक्र का अनुवर्तन नहीं करता है, वह पापमय जीवन जीता है और केवल इन्द्रियों में रमण करता है । ऐसे व्यक्ति का जीवन व्यर्थ है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ३.१४ व ३.१५ ("अन्नाद्भवन्ति भूतानि... कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि") की व्याख्या के अनुसार, वेदों को 'अपौरुषेय' (अक्षर समुद्भव) बताने का क्या अर्थ है तथा मानव निर्मित कृतियों और वेदों में क्या मूलभूत अंतर दर्शाया गया है?

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