भ. गी. 3.25

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् ॥

अनुवाद

हे भारत ! जैसे अज्ञानी मनुष्य आसक्ति के साथ कर्म करते हैं, उसी प्रकार विद्वान मनुष्य को चाहिए कि वह संसार के कल्याण की इच्छा रखते हुए आसक्ति से रहित होकर कर्म करे ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक में प्रयुक्त 'अतन्द्रितः' शब्द का क्या सूक्ष्म अर्थ समझाया गया है, तथा यदि भगवान कर्म न करें तो समाज पर उसका क्या दुष्परिणाम होगा?

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