भ. गी. 3.24
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥
अनुवाद
यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सभी लोक नष्ट हो जाएँगे और मैं समाज के वर्गों और उनके कर्तव्यों में व्यवधान का कारण बन जाऊँगा । इस प्रकार मैं इन लोगों के विनाश के लिए उत्तरदायी हो जाऊँगा ।
यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सभी लोक नष्ट हो जाएँगे और मैं समाज के वर्गों और उनके कर्तव्यों में व्यवधान का कारण बन जाऊँगा । इस प्रकार मैं इन लोगों के विनाश के लिए उत्तरदायी हो जाऊँगा ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार 'अतन्द्रितः' का तात्पर्य किसी अवकाश या सुविधानुसार कार्य करना नहीं है, और भगवान के कर्म त्यागने से मोक्ष नहीं बल्कि संपूर्ण सृष्टि का विनाश व अव्यवस्था उत्पन्न होगी]।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि 'अतन्द्रितः' का अर्थ बिना किसी आलस्य या तंद्रा के पूर्ण जागरूकता से कर्तव्य-कर्म करना है। भगवान कहते हैं कि यदि वे सतर्क होकर कार्य न करें तो समाज में अव्यवस्था फैलेगी और लोग भी कर्म त्यागकर अधर्म के मार्ग पर चले जाएँगे ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि जिस प्रकार अज्ञानी पुरुष सांसारिक फल की आसक्ति के कारण कठिन परिश्रम करता है, ज्ञानी को भी उसी तत्परता से कर्म करना चाहिए, परंतु व्यक्तिगत आसक्ति छोड़कर केवल लोक-संग्रह (समाज कल्याण) के लिए कार्य करना चाहिए। इसका सुंदर उदाहरण रामलीला/नाटक के अभिनेता का दिया गया है, जो मंच पर बिना आसक्ति के केवल अपना अभिनय कुशलता से निभाता है ।
विकल्प ख (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि व्याख्यान में ज्ञानी के लिए आसक्ति का पूर्णतः निषेध किया गया है और अनासक्त भाव से लोकसंग्रह हेतु कर्म करने का निर्देश दिया गया है]।
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