भ. गी. 3.27

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥

अनुवाद

सभी क्रियाएँ प्रकृति के गुणों से बनी हुई इन्द्रियों द्वारा संचालित होते हैं । फिर भी, जिसका मन अहंकार से भ्रमित है, वह सोचता है, “मैं कर्ता हूँ ।“

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ३.२६ ("न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम्...") में ज्ञानी पुरुष को अज्ञानी (कर्म में आसक्त) जीवों की बुद्धि को विचलित न करने की क्या मुख्य सलाह दी गई है, तथा बिना आंतरिक योग्यता के जबरन कर्म छुड़ाने पर क्या दुष्परिणाम दर्शाया गया है?

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