भ. गी. 3.27
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
अनुवाद
सभी क्रियाएँ प्रकृति के गुणों से बनी हुई इन्द्रियों द्वारा संचालित होते हैं । फिर भी, जिसका मन अहंकार से भ्रमित है, वह सोचता है, “मैं कर्ता हूँ ।“
सभी क्रियाएँ प्रकृति के गुणों से बनी हुई इन्द्रियों द्वारा संचालित होते हैं । फिर भी, जिसका मन अहंकार से भ्रमित है, वह सोचता है, “मैं कर्ता हूँ ।“
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि हर व्यक्ति का मार्ग उसकी पात्रता (अधिकारी-भेद) के अनुसार तय होता है। यदि कर्म में आसक्त व्यक्ति को बिना विवेक के कर्म-त्याग का उपदेश देकर विचलित किया जाएगा, तो वह बाहरी वेश तो साधु का धारण कर लेगा किंतु आंतरिक आसक्ति न जाने के कारण मंदिर या आश्रम को भी धन कमाने और व्यवसाय का केंद्र बना देगा। अतः विद्वान को चाहिए कि वह स्वयं निष्काम आचरण करके उन्हें कर्म में ही लगाए रखे।
विकल्प ख (गलत): यह विकल्प असत्य है क्योंकि श्लोक में भगवान ने स्पष्ट रूप से बुद्धि-भेद उत्पन्न करने और अज्ञानी से जबरन कर्म छुड़ाने का निषेध किया है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार शरीर की सांस लेने, पाचन आदि मूलभूत क्रियाओं पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता और न ही कुत्ता गाड़ी चलाता है, अतः यह विकल्प असत्य है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि जिस शरीर को मनुष्य ने न तो बनाया है और न खरीदा है, उसकी सभी क्रियाएँ प्रकृति के तीन गुणों द्वारा ही होती हैं। किंतु अज्ञानवश मनुष्य स्वयं को कर्ता मान लेता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे बैलगाड़ी के नीचे चलने वाला कुत्ता भ्रमवश समझता है कि गाड़ी वही चला रहा है, परंतु जब वह हट जाता है तो भी गाड़ी पूर्ववत चलती रहती है।
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