परन्तु हे महाबाहो ! जो व्यक्ति आत्मा से मन और इन्द्रियों (गुणों) तथा उनके कार्यों (कर्म) के भेद के सत्य को जानता है, वह अनासक्त रहता है, क्योंकि वह यह जानता है कि केवल मन और इन्द्रियाँ (गुण) ही अपने-अपने विषयों (गुणेषु) में संलग्न हैं ।
भगवद्गीता के श्लोक ३.२८ ("तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः...") के संदर्भ में यह शंका उठाई गई थी कि "यदि सभी क्रियाएँ प्रकृति के गुणों द्वारा ही हो रही हैं, तो मनुष्य का क्या उत्तरदायित्व है?"—व्याख्यान के अनुसार इस शंका का क्या दार्शनिक समाधान दिया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार मनुष्य केवल निर्जीव रोबोट नहीं है। शास्त्रों की आज्ञाएँ इसलिए हैं क्योंकि हमारे पास 'मानने' और 'अहंकार से असक्त रहने' का विवेक मौजूद है ।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि सब कुछ प्रकृति में होने पर भी, जब आत्मा अपने अहम् भाव को भौतिक अहंकार से जोड़ लेती है (चित्-जड़ ग्रंथि), तब वह भोक्ता व बद्ध बनती है। 'गुणा गुणेषु वर्तन्ते' (इंद्रियाँ अपने विषयों में विचर रही हैं) को समझकर असंग होना ही विवेक है, जो मनुष्य के अधिकार में है।
व्याख्यान के अनुसार, श्रीमद् जीव गोस्वामी के परमात्मा संदर्भ के आधार पर माया द्वारा निर्मित बंधन के 'उपादान कारण' और 'निमित्त कारण' में क्या सूक्ष्म अंतर समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि सांख्य के तत्व (शरीर, इंद्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंकार) उपादान कारण (जैसे कंप्यूटर का हार्डवेयर) हैं । इसके भीतर अविद्या से उत्पन्न ज्ञान, इच्छा, कृति और अहम् भाव निमित्त कारण (सॉफ्टवेयर की तरह) हैं, जिसके कारण आत्मा अज्ञानवश इस जड़ ढाँचे से जुड़कर स्वयं को कर्ता-भोक्ता मान लेती है ।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि मन, बुद्धि, अहंकार व पंचभूत उपादान कारण हैं, निमित्त नहीं ।