भ. गी. 3.35

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥

अनुवाद

स्वधर्म के पालन में भले ही किसी तरह का दुर्गुण हो, वह दूसरे के धर्म को अपनाने से श्रेष्ठ है, भले ही दूसरे के धर्म का पालन अच्छे से किया गया हो । यहाँ तक कि स्वधर्म का निर्वाह करते हुए मृत्यु भी हो जाए तो वह दूसरे के धर्म के पालन से श्रेष्ठ है, क्योंकि दूसरे के धर्म का पालन भयानक है ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ३.३५ ("श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्...") की व्याख्या के अनुसार, स्वधर्म का पालन दोषयुक्त होने पर भी परधर्म से श्रेष्ठ क्यों माना गया है, तथा परधर्म को 'भयावह' और 'चित्त की आत्महत्या' कहने का क्या कारण बताया गया है?

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