स्वधर्म के पालन में भले ही किसी तरह का दुर्गुण हो, वह दूसरे के धर्म को अपनाने से श्रेष्ठ है, भले ही दूसरे के धर्म का पालन अच्छे से किया गया हो । यहाँ तक कि स्वधर्म का निर्वाह करते हुए मृत्यु भी हो जाए तो वह दूसरे के धर्म के पालन से श्रेष्ठ है, क्योंकि दूसरे के धर्म का पालन भयानक है ।
भगवद्गीता के श्लोक ३.३५ ("श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्...") की व्याख्या के अनुसार, स्वधर्म का पालन दोषयुक्त होने पर भी परधर्म से श्रेष्ठ क्यों माना गया है, तथा परधर्म को 'भयावह' और 'चित्त की आत्महत्या' कहने का क्या कारण बताया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति का अपना एक स्वभाव और क्षमता होती है। अपने स्वभाव के विरुद्ध जाकर दूसरों के प्रलोभन में परधर्म अपनाना अपने चित्त का गला घोंटने के समान है। इससे व्यक्ति न तो दूसरों जैसा बन पाता है और न अपना स्वाभाविक विकास कर पाता है, जिससे जीवनभर असंतोष (जॉब डिसटिसफेक्शन) बना रहता है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार स्वधर्म का संबंध केवल धन कमाने से नहीं है और न ही परधर्म का अर्थ केवल वन में सो जाना है।
व्याख्यान में स्वधर्म के महात्म्य को समझाने के लिए महाभारत से दी गई कौशिक (ब्राह्मण) और धर्मव्याध की कथा का क्या मुख्य संदेश दर्शाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि चिड़िया को जलाना केवल अहंकार का प्रतीक था, सच्चा ज्ञान नहीं; तथा धर्मव्याध ने अपना मांस बेचने का व्यवसाय नहीं छोड़ा था बल्कि उसी में स्वधर्म का पालन करते हुए ज्ञान प्राप्त किया था।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि कौशिक ब्राह्मण को अपनी तपस्या का अभिमान हो गया था। गृहणी ने अपने पति-सेवा रूपी स्वधर्म से दिव्य दृष्टि पाई, और मिथिला के धर्मव्याध ने अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा तथा कुल-प्राप्त व्यवसाय को निष्काम भाव से निभाकर ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया, जिसे महाभारत में 'व्याध गीता' कहा गया है।