भ. गी. 3.34
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥
अनुवाद
इन्द्रियों का राग-द्वेष उनसे सम्बन्धित इन्द्रिय-विषयों में निहित होता है । मनुष्य को ऐसे राग-द्वेष के वश में नहीं आना चाहिए क्योंकि ये आध्यात्मिक साधक के मार्ग में बाधा है ।
इन्द्रियों का राग-द्वेष उनसे सम्बन्धित इन्द्रिय-विषयों में निहित होता है । मनुष्य को ऐसे राग-द्वेष के वश में नहीं आना चाहिए क्योंकि ये आध्यात्मिक साधक के मार्ग में बाधा है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि राग-द्वेष दो प्रकार के हैं—एक स्वाभाविक (जीवन-रक्षा के लिए आवश्यक, जैसे जलने पर तुरंत हाथ पीछे हटाना) और दूसरा अभ्यास-जनित या संस्कार-जन्य (जो लत या कुसंग से पैदा होता है)। श्लोक में इन्हें 'परिपन्थिनौ' कहा गया है, जिसका अर्थ मार्ग का रोड़ा या दिन-दहाड़े लूटने वाला डाकू/लुटेरा है जो साधक के विवेक को हर लेता है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार परिपन्थिनौ का अर्थ मित्र या अतिथि नहीं बल्कि लुटेरे/डाकू है, और राग-द्वेष के दो प्रकार स्वाभाविक व अभ्यास-जनित बताए गए हैं।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि राग-द्वेष विषयों में नहीं होते (क्योंकि एक ही विषय किसी को प्रिय और किसी को अप्रिय लगता है, जैसे शराब या मांसाहार) और न ही हठपूर्वक शरीर दबाने से ये मिटते हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता पतंजलि योगसूत्र के आधार पर बताते हैं कि राग-द्वेष की जननी अविद्या (चित्-जड़ ग्रंथि) है जो अहंकार को पोषित करती है। इन्हें दूर करने के लिए कर्मयोग की दृष्टि से बुद्धि के विवेक व जागरूकता द्वारा निर्णयों को परखना चाहिए, और भक्तियोग की दृष्टि से अपने कर्मों में निष्काम सेवा भाव का समावेश करना चाहिए।
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