श्रीभगवान् ने उत्तर दिया - यह भौतिक इच्छा (काम) है, जो रजोगुण से उत्पन्न होती है और बाद में क्रोध में बदल जाती है । वह तृप्त नहीं होती और अत्यन्त अशुभ है । इसे मोक्षमार्ग का शत्रु जानो ।
व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ३.३७ में वर्णित 'काम' की कौन सी तीन अवस्थाएँ बतलाई गई हैं, तथा 'बीज अवस्था' कहाँ और किस रूप में स्थित रहती है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में काम की तीन अवस्थाएँ जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति नहीं बल्कि बीज, अंकुरित और फल अवस्थाएँ बतलाई गई हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि काम की तीन अवस्थाएँ होती हैं—बीज अवस्था (जो हमारे चित्त में संस्कार रूप में बैठी रहती है), अंकुरित अवस्था (जब मन में उस कामना का चिंतन व चंचलता उत्पन्न होती है), और फल अवस्था (जब व्यक्ति उस कर्म को भोगने में लग जाता है)।
व्याख्यान के अनुसार, मनुष्य द्वारा अनुभव किए जाने वाले तीन प्रकार के सुख कौन से बतलाए गए हैं, तथा 'अभिमान के सुख' की तुलना शास्त्रों में किससे की गई है? विकल्प:
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि सुख तीन प्रकार के होते हैं—विषय के साथ इंद्रिय के प्रत्यक्ष संयोग का सुख, बिना विषय-संयोग के केवल पद, प्रतिष्ठा, धन, विद्या या अनुयायियों के अभिमान का सुख, तथा केवल मन ही मन कल्पना या स्वप्न करने वाला मनोराज्य का सुख। इनमें अभिमान के सुख को सुरापान (मदिरापान) के समान मद उत्पन्न करने वाला बताया गया है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार अभिमान के सुख को अमृत नहीं बल्कि मदिरापान (सुरापान) के समान बुद्धि भ्रष्ट करने वाला नशा कहा गया है।