भ. गी. 3.38
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥
अनुवाद
जिस प्रकार अग्नि धुएँ से, दर्पण धूल से तथा भ्रूण गर्भ से ढका रहता है, उसी प्रकार ज्ञान भी काम से ढका रहता है ।
जिस प्रकार अग्नि धुएँ से, दर्पण धूल से तथा भ्रूण गर्भ से ढका रहता है, उसी प्रकार ज्ञान भी काम से ढका रहता है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार धुआँ अग्नि को पूरी तरह नष्ट नहीं करता बल्कि कुछ समय के लिए ढक लेता है, जो सात्विक अवस्था का प्रतीक है जहाँ थोड़ा सा विवेक जाग्रत करते ही अज्ञान हट जाता है। दर्पण पर धूल का जमना राजसिक अवस्था है, जिसमें चित्त पर वासनाओं की धूल जमने से मनुष्य अपना वास्तविक स्वरूप नहीं देख पाता। महाप्रभु के उपदेशानुसार हरिनाम-कीर्तन से चित्त-रूपी दर्पण की धूल साफ़ हो जाती है।
विकल्प ख (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि धुआँ अग्नि को नष्ट नहीं करता और दर्पण की धूल हटाई जा सकती है, वह स्थायी रूप से टूटता नहीं है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि गर्भ का झिल्ली से ढकना स्वतंत्रता का नहीं बल्कि अज्ञानता के पूर्ण बंधन और असहायता का प्रतीक है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि जिस प्रकार गर्भ में झिल्ली से बँधा बालक असहाय होकर हाथ-पैर नहीं हिला सकता, उसी प्रकार तामसिक बुद्धि से ढका व्यक्ति अज्ञान में ऐसा जकड़ जाता है कि उसे सही और गलत का बोध ही नहीं रहता। वह अपने स्वास्थ्य व जीवन को नष्ट करने वाले कुव्यसनों में भी भ्रमवश सुख मानता है।
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