भ. गी. 3.39
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥
अनुवाद
हे अर्जुन ! यह काम ज्ञानियों का नित्य शत्रु है । यह अग्नि के समान कभी न बुझने वाला है एवं विवेक को ढक लेता है।
हे अर्जुन ! यह काम ज्ञानियों का नित्य शत्रु है । यह अग्नि के समान कभी न बुझने वाला है एवं विवेक को ढक लेता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार सिद्ध पुरुष के लिए काम वैरी नहीं रह जाता क्योंकि वह गुणातीत हो चुका है; नित्य वैरी का अर्थ अनादि वैरी है जिसका अंत ज्ञान से संभव है; और भोगों से काम कभी समाप्त नहीं होता।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि यहाँ 'ज्ञानी' का तात्पर्य तत्व-ज्ञान प्राप्त करने के मार्ग में लगे साधक से है। अज्ञानी तो काम को मित्र मानकर भोगों के पीछे भागता है, जबकि साधक समझता है कि यह कल्याण का बाधक (वैरी) है। 'नित्य' का तात्पर्य अनादि से है क्योंकि आत्मज्ञान से इसका नाश संभव है। 'दुष्पूरेण अनलेन' का अर्थ है कि अग्नि की भाँति उपभोग से काम कभी शांत नहीं होता; हम चेतन स्वरूप हैं, इसलिए जड़ वस्तुओं के भोग से हमारी तृप्ति नहीं हो सकती।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि काम के बैठने के तीन मुख्य ठिकाने (अधिष्ठान)—इंद्रियाँ, मन और बुद्धि हैं (तथा मूल में अहंकार है)। उपनिषद के रथ-दृष्टांत के अनुसार शरीर रथ, इंद्रियाँ घोड़े, मन लगाम, बुद्धि सारथी और आत्मा यात्री है। जब शत्रु (काम) सारथी (बुद्धि), लगाम (मन) और घोड़ों (इंद्रियों) पर कब्जा कर लेता है, तो वह आत्म-ज्ञान को ढककर आत्मा को भ्रमित कर देता है।
विकल्प ख (गलत): यह कथन असत्य है क्योंकि व्याख्यान के अनुसार काम का अधिष्ठान केवल बाह्य वातावरण नहीं बल्कि हमारे भीतर स्थित इंद्रियाँ, मन और बुद्धि हैं; तथा रथ में आत्मा यात्री और बुद्धि सारथी है।
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