भ. गी. 3.4

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥

अनुवाद

नियत कर्मों का पालन किए बिना मनुष्य कर्म के बन्धन से मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता है तथा अशुद्ध हृदय वाला व्यक्ति नियत कर्म के परित्याग करने मात्र से सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोक ३.३ ("लोकेस्मिन द्विविधा निष्ठा...") में भगवान द्वारा अर्जुन को 'अनघ' (निष्पाप) सम्बोधित करने के क्या दो मुख्य शास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक कारण बताए गए हैं?

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