भ. गी. 3.4
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥
अनुवाद
नियत कर्मों का पालन किए बिना मनुष्य कर्म के बन्धन से मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता है तथा अशुद्ध हृदय वाला व्यक्ति नियत कर्म के परित्याग करने मात्र से सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता ।
नियत कर्मों का पालन किए बिना मनुष्य कर्म के बन्धन से मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता है तथा अशुद्ध हृदय वाला व्यक्ति नियत कर्म के परित्याग करने मात्र से सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार भगवान अर्जुन को संन्यास लेने के लिए बाध्य नहीं कर रहे थे और न ही 'अनघ' का संबंध युद्ध न करने से है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि 'अघ' का अर्थ पाप है और 'अनघ' का अर्थ निष्पाप है। पहला कारण यह है कि जब तक हृदय में पाप के संस्कार (मलिनता) रहते हैं, तब तक शास्त्र या वक्ता का वास्तविक भाव समझ में नहीं आता (जैसे धूल जमे दर्पण में चेहरा साफ नहीं दिखता)। दूसरा मनोवैज्ञानिक कारण यह है कि किसी को बार-बार 'पापी' या 'मूर्ख' कहने से उसमें हीनभावना और दोष-भाव (gilt feeling) आता है, जबकि निष्पाप कहने से साधक का उत्साह बढ़ता है और वह पाप करने से डरता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि केवल कर्मों का आरंभ न करना या संन्यास का चोला पहन लेना मोक्ष या सिद्धि नहीं दिला सकता।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि 'नैष्कर्म्य' ब्रह्म भाव का नाम है जहाँ कोई कर्म का बंधन नहीं रहता। यह केवल कर्मों को बंद करने या जबरन त्यागने से नहीं मिलता। जैसे कच्चे नारियल से गिरी को खुरचकर निकालना पड़ता है, परंतु सूखा नारियल हिलने पर स्वतः अपने खोल से अलग हो जाता है; वैसे ही साधक को कर्म त्यागना नहीं पड़ता, बल्कि निष्काम भाव से कर्म करते हुए फलासक्ति मिटने पर कर्म का बंधन स्वतः छूट जाता है।
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