भ. गी. 3.5
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥
अनुवाद
वस्तुतः कोई भी व्यक्ति एक क्षण भी बिना कर्म किये नहीं रह सकता क्योंकि प्रकृतिजन्य गुण प्रत्येक व्यक्ति को असहाय होकर कर्म करने के लिए विवश कर देते हैं ।
वस्तुतः कोई भी व्यक्ति एक क्षण भी बिना कर्म किये नहीं रह सकता क्योंकि प्रकृतिजन्य गुण प्रत्येक व्यक्ति को असहाय होकर कर्म करने के लिए विवश कर देते हैं ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार 'जातु' का अर्थ केवल जागृत अवस्था तक सीमित नहीं है। इसके अतिरिक्त, मनुष्य प्रकृति के गुणों के अधीन होकर कार्य करता है, अतः वह सर्वथा स्वतंत्र नहीं है।
विकल्प ख (सही): वक्ता बताते हैं कि 'जातु' का अर्थ किसी भी समय यानी जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति और मूर्छा (कोमा) आदि सभी अवस्थाओं में है। इस श्लोक में 'कार्यते ह्यवशः कर्म' कहकर यह स्पष्ट किया गया है कि प्रकृति के तीन गुणों से बंधे होने के कारण मनुष्य अवश (विवश) होकर कर्म करता है; अतः यहाँ पश्चिमी 'फ्री विल' जैसी स्वतंत्रता का खंडन होता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि जो व्यक्ति बाह्य रूप से तो इंद्रियों को रोक लेता है पर मन से विषयों का चिंतन करता रहता है, उसकी बुद्धि भ्रमित होती है और वह 'मिथ्याचारी' (दंभी) कहलाता है। इसका सुंदर दृष्टांत 'बगुला भगत' (बक परम धार्मिकः) का दिया गया है जो एक टांग पर खड़े होकर निष्पाप दिखने का नाटक करता है पर उसका मन केवल मछली लीलने में रहता है। यह आसुरी संपत्ति के पहले दोष 'दंभ' को दर्शाता है।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान के अनुसार बगुले का दृष्टांत स्थितप्रज्ञ की पवित्रता के लिए नहीं बल्कि दंभ और मिथ्याचार को दर्शाने के लिए दिया गया है।
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