भ. गी. 3.43

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥

अनुवाद

हे महाबाहु अर्जुन ! इस प्रकार आत्मा को बुद्धि से परे जानकर तथा निश्चयात्मक बुद्धि द्वारा मन को स्थिर करके, इस दुर्जेय कामरूपी शत्रु का नाश करो ।

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प्रश्न 1, कुल 2

व्याख्यान के अनुसार, 'इंद्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः...' श्लोक में इंद्रियों, मन और बुद्धि का जो तारतम्य (क्रम) बताया गया है, उसके अनुसार मन को इंद्रियों से परे और बुद्धि को मन से परे क्यों माना गया है?

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