भ. गी. 3.43
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥
अनुवाद
हे महाबाहु अर्जुन ! इस प्रकार आत्मा को बुद्धि से परे जानकर तथा निश्चयात्मक बुद्धि द्वारा मन को स्थिर करके, इस दुर्जेय कामरूपी शत्रु का नाश करो ।
हे महाबाहु अर्जुन ! इस प्रकार आत्मा को बुद्धि से परे जानकर तथा निश्चयात्मक बुद्धि द्वारा मन को स्थिर करके, इस दुर्जेय कामरूपी शत्रु का नाश करो ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान के अनुसार यह कथन असत्य है क्योंकि मन स्वप्नावस्था में बिना इंद्रियों के भी कार्य कर सकता है, तथा बुद्धि मन की अवस्था को देखने और नियंत्रित करने वाली उच्च शक्ति है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि यदि मन कहीं और हो तो कान में शब्द जाने पर भी सुनाई नहीं देता, इसलिए मन इंद्रियों से श्रेष्ठ है। इसके अलावा, मन अशांत क्यों है यह विवेकपूर्वक बुद्धि ही जान सकती है तथा सुसुप्ति के अनुभव की स्मृति भी बुद्धि के गुण से जुड़ी होती है, इसलिए बुद्धि मन से भी परे है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि केवल हठपूर्वक शरीर को कष्ट देना या अत्यधिक भूखे रहना साधना का सही मार्ग नहीं है।
विकल्प ख (सही): वक्ता समझाते हैं कि काम रूपी दुर्जय शत्रु को पराजित करने के लिए बुद्धि का प्रयोग करके चार स्तरों पर नियमन करना पड़ता है—काल (अपनी दैनिक अनुशासित दिनचर्या बनाना), देश (स्थान व मंदिर का आध्यात्मिक उपयोग), व्यक्ति (व्यर्थ के संबंधों में समय न गँवाना), और वस्तु (स्वेच्छा से संयम व तप का पालन करना)।
इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।