भ. गी. 4.1
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥
अनुवाद
श्रीभगवान् ने कहा - मैंने सूर्य देव विवस्वान को यह अविनाशी योग सिखाया था । फिर विवस्वान ने इसे मनु को बताया और मनु ने इसे राजा इक्ष्वाकु को सुनाया।
श्रीभगवान् ने कहा - मैंने सूर्य देव विवस्वान को यह अविनाशी योग सिखाया था । फिर विवस्वान ने इसे मनु को बताया और मनु ने इसे राजा इक्ष्वाकु को सुनाया।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता समझाते हैं कि शास्त्र में कोई भी बात असंबद्ध नहीं होती, बल्कि संगति (जैसे अवसर संगति) के अनुसार चलती है। तीसरे अध्याय के अंत में प्रश्न का उत्तर पूरा होने के बाद कर्मयोग के प्रवाह को पुनः आरंभ करने के लिए भगवान स्वयं बोलते हैं। शास्त्रों में दिखाई देने वाला मतभेद वास्तव में 'अधिकारी-भेद' (विद्यार्थी/साधक की योग्यता) पर आधारित है, जबकि सभी शास्त्रों का अंतिम समन्वय ('तत्तु समन्वयात्') परमेश्वर में ही है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि शास्त्रों में कोई विरोध नहीं बल्कि विरोधाभास है, और उनका उद्देश्य एक ही भगवत्तत्व का प्रतिपादन करना है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि भगवान विवस्वान, मनु और इक्ष्वाकु की परंपरा बताकर यह स्पष्ट करते हैं कि यह सनातन योग प्रामाणिक है। तीसरे और चौथे अध्याय में अंतर यह है कि तीसरे अध्याय में कर्मयोग के महत्व (महिमा) पर बल था, जबकि चौथे अध्याय में कर्मयोग के अपने स्वरूप (कर्म, अकर्म और विकर्म का रहस्य) को समझाया गया है।
विकल्प ख (गलत): यह विकल्प गलत है क्योंकि विवस्वान, मनु और इक्ष्वाकु सभी गृहस्थ क्षत्रिय थे जिन्होंने संन्यास नहीं लिया था, और तीसरे अध्याय में निष्काम कर्मयोग का ही वर्णन था।
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