भ. गी. 4.2
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥
अनुवाद
राजर्षियों ने इस ज्ञानयोग को परम्परा से प्राप्त करके इसी प्रकार समझा । हे शत्रुओं को सन्तप्त करने वाले ! समय के दीर्घ अन्तराल में यह योग संसार से धीरे धीरे लुप्त हो गया।
राजर्षियों ने इस ज्ञानयोग को परम्परा से प्राप्त करके इसी प्रकार समझा । हे शत्रुओं को सन्तप्त करने वाले ! समय के दीर्घ अन्तराल में यह योग संसार से धीरे धीरे लुप्त हो गया।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि व्याख्यान में स्पष्ट किया गया है कि सत्य कभी नया या पुराना नहीं होता और न ही नष्ट होता है; भगवान वही अनादि व पुरातन योग पुनः प्रकट करते हैं।
विकल्प ख (सही): वक्ता स्पष्ट करते हैं कि पिछले श्लोक में जिसे 'अव्यय' कहा गया, उसका विनाश संभव नहीं है। यहाँ 'नष्ट' धातु अदर्शन अर्थ में आई है, जिसका तात्पर्य वस्तु का नष्ट होना नहीं बल्कि अज्ञान व भोग-आसक्ति के कारण हमारी दृष्टि से ओझल या लुप्त (छुपा हुआ) हो जाना है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता बताते हैं कि आध्यात्मिक विद्या केवल भौतिक शब्दावली या पठन से प्राप्त नहीं होती। इसके लिए शिष्य को गुरु या भगवान के साथ श्रद्धा व प्रीति द्वारा 'हृदय का एकत्व' स्थापित करना पड़ता है। 'भक्तोऽसि मे सखा च' कहकर भगवान अर्जुन के पात्र को तैयार करते हैं और उनके हृदय को खोलते हैं ताकि दिव्य ज्ञान सीधा प्रकाशित हो सके।
विकल्प ख (गलत): व्याख्यान में इस विचार का खंडन किया गया है; ज्ञान को रहस्य रखने का उद्देश्य स्वार्थ नहीं बल्कि अनधिकारी द्वारा उसका दुरुपयोग रोकना और पात्र की योग्यता निर्मित करना है।
इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।