भ. गी. 4.12

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥

अनुवाद

अपने कर्मों के फल चाहने वाले मनुष्य देवताओं की पूजा करते हैं क्योंकि इस मनुष्यलोक में कर्म से उत्पन्न होने वाली सफलता शीघ्र मिलती है ।

वीडियो व्याख्याएँ देखें

अपनी समझ परखें

प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ४.१२ ("काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः...") की व्याख्या के अनुसार, प्रायः लोग भगवान की प्रत्यक्ष शरण न लेकर देवी-देवताओं का पूजन क्यों करते हैं, तथा फल प्रदान करने में भगवान और देवताओं के दृष्टिकोण में क्या मौलिक अंतर बतलाया गया है?

प्रश्न पूछें

पोस्ट करने के लिए साइन इन करें

अभी कोई प्रश्न नहीं

इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।