भ. गी. 4.11

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥

अनुवाद

हे पृथापुत्र, जो मेरी शरण में आते हैं, मैं उनके साथ उनकी शरणागति के अनुरूप ही व्यवहार करता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य [चाहे उनका स्वभाव जो भी हो] हर प्रकार से मेरे मार्ग का अनुसरण करते हैं ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ४.१० ("वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः...") की व्याख्या के अनुसार, 'वीतराग' शब्द का क्या वास्तविक दार्शनिक अर्थ बतलाया गया है, तथा केवल बाह्य तपस्या करने वाले साधकों में बहुधा 'क्रोध' उत्पन्न होने का क्या आंतरिक कारण दर्शाया गया है?

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